पूरी तरह बेतुका: मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने टाइगर कॉरिडोर में सीमित रास्तों पर उठाए सवाल, अधिकारियों को किया तलब
मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने NH-46 के चौड़ीकरण परियोजना में टाइगर कॉरिडोर के लिए प्रस्तावित सीमित वन्यजीव मार्गों पर कड़ा सवाल उठाते हुए इसे पूरी तरह बेतुका करार दिया।
कोर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के सीनियर अधिकारियों को तलब कर विस्तृत जवाब मांगा।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने पाया कि 16 किलोमीटर लंबे महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर में केवल लगभग 1.2 से 1.5 किलोमीटर हिस्से में ही पशुओं के लिए मार्ग प्रस्तावित किया गया, जबकि पहले से बना एक 500 मीटर का रास्ता अलग है।
इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या बाघों को यह पता होगा कि 14 किलोमीटर दूर जाकर उन्हें एक संकरे रास्ते का उपयोग करना है। अदालत ने इसे पूर्णतः अव्यावहारिक बताया।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि एक मीटर चौड़े पाइप जैसे संकरे रास्तों का उपयोग क्या वास्तव में बाघ जैसे बड़े वन्यजीव कर पाएंगे।
अदालत ने कहा कि ऐसे छोटे रास्ते अक्सर अवरुद्ध हो जाते हैं और व्यवहारिक नहीं होते।
मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने आवश्यक अनुमति लिए बिना हाईवे चौड़ीकरण का कार्य शुरू किया, जबकि यह क्षेत्र सतपुड़ा और मेलघाट टाइगर रिजर्व को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण कॉरिडोर है।
पहले भी हाइकोर्ट ने 2022 में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य पर रोक लगाई थी और केवल मरम्मत कार्य की अनुमति दी थी।
हालिया सुनवाई में यह मुद्दा उठा कि क्या प्रस्तावित उपाय वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त हैं। अदालत ने कहा कि जैसे इंसान भी लंबा घुमाव लेने के बजाय सीधे रास्ता चुनते हैं, वैसे ही जानवर भी प्राकृतिक रास्ता ही अपनाते हैं।
इन सभी सवालों के मद्देनजर कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे समग्र योजना (इंटीग्रेटेड लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान) के बारे में विस्तार से जानकारी दें और यह स्पष्ट करें कि वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल, 2026 को निर्धारित की गई।