नोटरीकृत समझौते से न तो हिंदू विवाह वैध होता है, न तलाक: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह को न तो केवल नोटरीकृत समझौते के आधार पर संपन्न माना जा सकता है और न ही ऐसे समझौते के जरिए वैध रूप से समाप्त किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह कोई अनुबंध नहीं है, इसलिए केवल नोटरीकृत विवाह समझौते से वैध विवाह नहीं माना जाएगा।
यह टिप्पणी जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।
पूरा मामला
मामला सुमन बाई से जुड़ा था जो जनजातीय एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग में चौकीदार के पद पर स्थायी कर्मचारी थीं। सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद अपीलकर्ता राम कृपाल ने स्वयं को उनका पति बताते हुए पेंशन और अन्य सेवा संबंधी लाभों की मांग की।
हालांकि, राज्य सरकार ने दावा किया कि सेवा अभिलेखों के अनुसार कोक सिंह ही सुमन बाई के पति थे, इसलिए राम कृपाल इन लाभों के हकदार नहीं हैं।
एकल पीठ ने यह कहते हुए राम कृपाल की याचिका खारिज कर दी थी कि वह सुमन बाई से अपने वैध विवाह को साबित नहीं कर सके। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने खंडपीठ में अपील दायर की थी।
राम कृपाल की ओर से दलील दी गई कि सुमन बाई का पहला विवाह कोक सिंह से हुआ था लेकिन वर्ष 1998 में दोनों ने नोटरीकृत तलाक समझौता कर लिया था। इसके बाद सुमन बाई और राम कृपाल ने कथित रूप से विवाह कर लिया।
अदालत ने पाया कि कोक सिंह और सुमन बाई के बीच केवल नोटरीकृत तलाक समझौता हुआ था लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत कभी भी सक्षम अदालत में तलाक की याचिका दायर नहीं की गई और न ही कोई तलाक की डिक्री पारित हुई।
अदालत ने कहा,
"केवल नोटरीकृत तलाक समझौता कर लेने से तलाक प्रभावी नहीं हो जाता। जब तक सक्षम अदालत तलाक की डिक्री पारित नहीं करती, तब तक वैवाहिक संबंध समाप्त नहीं माने जा सकते।"
पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में सुमन बाई और कोक सिंह का विवाह कानूनन जारी रहा।
सुमन बाई और राम कृपाल के कथित विवाह पर अदालत ने कहा कि उनके बीच कोई न्यायालयीन विवाह भी नहीं हुआ था। विवाह संबंधी नोटरीकृत दस्तावेज में यह उल्लेख जरूर था कि समाज में इस प्रकार विवाह करने की प्रथा है, लेकिन अपीलकर्ता ऐसी किसी प्रथा का एक भी विश्वसनीय उदाहरण या कानूनी मान्यता प्रस्तुत नहीं कर सके।
अदालत ने कहा,
"हिंदू कानून के तहत विवाह कोई अनुबंध नहीं है। इसलिए केवल नोटरीकृत विवाह समझौते के आधार पर विवाह संपन्न नहीं माना जा सकता।"
पीठ ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर राम कृपाल और सुमन बाई के बीच अधिकतम सहजीवन (लिव-इन संबंध) माना जा सकता है। हालांकि, केवल इस आधार पर उन्हें वैध पति का कानूनी दर्जा या सेवा संबंधी लाभ नहीं दिए जा सकते।
इन टिप्पणियों के साथ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राम कृपाल की अपील खारिज की।