रिश्वत में दोषी कर्मचारी पर विभागीय जांच जरूरी नहीं, बर्खास्तगी बरकरार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि रिश्वत के मामले में दोषसिद्ध सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विस्तृत विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं होती। अदालत ने एक पूर्व सरकारी कर्मचारी की सेवा से बर्खास्तगी के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।
जस्टिस विशाल धगत की पीठ ने कहा कि जब किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में पूरा अवसर मिल चुका हो और उसे दोषी ठहराया जा चुका हो, तो उसी तथ्यों पर दोबारा विभागीय जांच कराना सार्वजनिक हित और प्रशासनिक दक्षता के विपरीत होगा।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता को लोकायुक्त द्वारा रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया था और बाद में उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत दोषी ठहराते हुए 5 वर्ष की सजा और ₹25,000 का जुर्माना लगाया गया। इसके बाद मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमों के तहत उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसे बर्खास्त करने से पहले सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। साथ ही, उसने यह भी कहा कि उसकी आपराधिक अपील अभी लंबित है, इसलिए अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि नियम 19 के तहत, यदि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया है, तो उसके आचरण के आधार पर बिना विस्तृत विभागीय जांच के भी दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
कोर्ट ने Union of India v Tulsiram Patel के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि दोषसिद्धि के बाद नई जांच आवश्यक नहीं होती और सजा सीधे दी जा सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि न्याय और सार्वजनिक हित प्रभावित हो। भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी कर्मचारियों को सेवा में बनाए रखना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा।