मंदिर पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी वाले वीडियो को हटाने का ब्लैंकेट आदेश नहीं दे सकता हाईकोर्ट: जांच एजेंसी पहले करे वीडियो की सत्यता और संदर्भ की पड़ताल
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्य सचिव ए.वी. सिंह की बहू को लेकर वायरल हुए उस वीडियो को सोशल मीडिया से हटाने के लिए व्यापक आदेश देने से इनकार किया, जिसमें भोपाल की एक आवासीय सोसायटी के निवासियों के साथ विवाद के दौरान मंदिर को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने का आरोप है।
जस्टिस हिमांशु जोशी ने कहा कि वीडियो की वास्तविकता, उसकी पूर्णता और पूरे घटनाक्रम के संदर्भ की जांच सक्षम जांच एजेंसी द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के तहत की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि इस स्तर पर यह निष्कर्ष देना उचित नहीं होगा कि संबंधित वीडियो वास्तव में मानहानिकारक, सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ या AI से तैयार की गई सामग्री है। इसके लिए मूल सामग्री और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच जरूरी है। इसी तरह बिना किसी विशेष आपत्तिजनक सामग्री की पहचान और जांच किए निजी सोशल मीडिया मंचों को समस्त संबंधित सामग्री हटाने का व्यापक निर्देश सामान्य तौर पर रिट अधिकार क्षेत्र में नहीं दिया जा सकता।
याचिकाकर्ता का कहना था कि पूरा घटनाक्रम सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरों के अलावा एक बिना संपादन वाले वीडियो में भी रिकॉर्ड हुआ। आरोप लगाया गया कि बाद में इस घटनाक्रम के कुछ हिस्सों को काट-छांटकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया और ऐसे शीर्षक लगाए गए, जिनसे मामले को सांप्रदायिक रंग मिला तथा याचिकाकर्ता पर ऐसे धार्मिक बयान देने का झूठा आरोप लगाया गया, जो उसने कथित तौर पर दिए ही नहीं थे।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि वीडियो प्रसारित होने के बाद उसे और उसके परिवार को धमकी भरे फोन और संदेश मिलने लगे। उसने 29 जुलाई से पुलिस अधिकारियों, राज्य साइबर पुलिस और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायतें करने का दावा किया। पुलिस ने 10 अगस्त को उसका बयान भी दर्ज किया लेकिन उसके अनुसार कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उसने मामले की जांच किसी अन्य एजेंसी को सौंपने की मांग भी की थी।
दूसरी ओर संबंधित अधिकारियों की ओर से कहा गया कि याचिका में लगाए गए आरोप विवादित तथ्यों से जुड़े हैं और कानून के अनुसार कार्रवाई की जा रही है। यह भी दलील दी गई कि वर्ष 2000 के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सोशल मीडिया सामग्री को हटाने के लिए व्यापक आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत संपादित वीडियो के प्रसार और उसके बाद उसे तथा उसके परिवार को मिली धमकियों से संबंधित है। इन पहलुओं की जांच सक्षम जांच एजेंसी को करनी होगी। इसलिए अदालत ने वीडियो से संबंधित समस्त सामग्री हटाने का व्यापक आदेश देने से इनकार किया।
हालांकि, व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर जताई गई चिंता को देखते हुए अदालत ने कहा कि शिकायत से स्पष्ट है कि मामला पहले ही सक्षम अधिकारियों के संज्ञान में लाया जा चुका है। संबंधित अधिकारियों को शिकायत पर विचार कर कानून के अनुसार जांच और आवश्यक कार्रवाई करनी होगी।
FIR दर्ज करने की मांग पर अदालत ने कहा कि पुलिस प्राधिकारी शिकायत पर विचार करेंगे और यदि आरोपों से किसी संज्ञेय अपराध के होने का पता चलता है तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करेंगे। हालांकि, केवल आशंका के आधार पर FIR दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब यह दिखाने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है कि मौजूदा जांच निष्पक्ष नहीं है या निष्पक्ष तरीके से जांच कर पाना संभव नहीं है।
सोशल मीडिया से आपत्तिजनक सामग्री हटाने की मांग पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित वीडियो के विशिष्ट यूआरएल और अन्य सामग्री का विवरण सक्षम प्राधिकारी के समक्ष देने की स्वतंत्रता दी। अदालत ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार उस शिकायत पर विचार करेगा।
पुलिस सुरक्षा की मांग पर हाईकोर्ट ने भोपाल के पुलिस आयुक्त को याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर विचार करने और खतरे की स्थिति को देखते हुए आवश्यक होने पर एहतियाती सुरक्षा उपाय करने का निर्देश दिया।