एमपी हाईकोर्ट का अहम फैसला: कोर्ट जांच एजेंसी को अपनी राय के मुताबिक चार्जशीट दाखिल करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि क्लोजर रिपोर्ट पर विचार करते समय अदालत जांच एजेंसी को केवल इसलिए चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश नहीं दे सकती कि अदालत जांच के नतीजे पर जांच एजेंसी की राय से सहमत नहीं है। जांच के बाद मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जाए या क्लोजर रिपोर्ट पेश की जाए, इस संबंध में राय बनाना जांच एजेंसी के वैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, कानून के तहत सक्षम अदालत को उपलब्ध न्यायिक अधिकार बरकरार रहते हैं।
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर फैसला सुनाते हुए की, जिसमें स्पेशल जज, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम द्वारा 12 फरवरी 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी गई। स्पेशल जज ने जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार करते हुए आगे की जांच के निर्देश दिए।
मामला उज्जैन स्थित औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के तत्कालीन प्राचार्य एस.एम. कुंभारे से जुड़ा था। मध्य प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग ने कथित अनियमितताओं को लेकर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ को पत्र भेजा था। जांच के दौरान सामने आया कि कुंभारे के कार्यकाल में करीब 96.23 लाख रुपये की सामग्री सीमित निविदा के जरिए खरीदी गई, जबकि खरीद के लिए खुली निविदा की प्रक्रिया अपनाई जानी थी।
जांच में यह भी पाया गया कि लघु उद्योग निगम के लिए आरक्षित सामग्री, जिसमें फर्नीचर भी शामिल था सीमित निविदा के जरिए खरीदी गई। आरोप था कि तीन फर्मों से प्राप्त कोटेशन एक ही व्यक्ति से संबंधित थे और आपूर्तिकर्ता के साथ मिलीभगत के कारण सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ।
जांच के दौरान संबंधित सामग्री की आपूर्ति करने वाली कई फर्मों का भी उल्लेख सामने आया। मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 और 120-बी के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोपों से संबंधित अपराध दर्ज किया गया।
हालांकि, जांच पूरी होने के बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने सरकार को मामले को बंद करने की अनुमति देने की सिफारिश की। जांच एजेंसी का आधार यह था कि सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाए जाने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।
यह पहली बार नहीं था जब क्लोजर रिपोर्ट अदालत के सामने आई। पहली क्लोजर रिपोर्ट को 27 अक्टूबर 2021 को स्पेशल जज ने स्वीकार नहीं किया और कई बिंदुओं पर साक्ष्य जुटाने तथा आगे की जांच के निर्देश दिए। इसके बाद दूसरी क्लोजर रिपोर्ट पेश की गई, जिसे 17 मई 2025 को फिर खारिज कर दिया गया और जांच अधिकारी को आगे की जांच के निर्देश दिए गए।
इसके बाद 2025 में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की गई। इसका निपटारा करते हुए स्पेशल जज को सुप्रीम कोर्ट के अबिनंदन झा बनाम दिनेश मिश्रा मामले में दिए गए फैसले के अनुरूप मामले पर विचार करने का निर्देश दिया गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मजिस्ट्रेट पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में व्यक्त राय को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है।
मामला वापस आने के बाद स्पेशल जज ने 12 फरवरी 2026 को फिर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और लगभग उन्हीं पहलुओं पर आगे की जांच के निर्देश दिए।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार न किया जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध हो गए।
खंडपीठ ने कहा कि जांच एजेंसी को अदालत अपनी पसंद की राय बनाने या अदालत की राय के अनुरूप आरोप पत्र दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच के नतीजे के संबंध में राय बनाना जांच एजेंसी के वैधानिक क्षेत्र में आता है, हालांकि सक्षम अदालत के कानूनी अधिकार अपनी जगह बने रहते हैं।
अदालत ने विभागीय अनियमितता और आपराधिक जिम्मेदारी के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया।
खंडपीठ ने कहा,
"विभागीय अनियमितता अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी का प्रमाण नहीं हो सकती। आपराधिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत होती है और संबंधित व्यक्ति को अपराध से जोड़ने वाली ठोस सामग्री पर आधारित होनी चाहिए।"
धोखाधड़ी के आरोप पर हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत अपराध के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि लेनदेन की शुरुआत से ही संबंधित व्यक्ति की मंशा धोखाधड़ी या बेईमानी की थी। केवल खरीद प्रक्रिया में अनियमितता या बाद में किसी नियम का पालन न किया जाना, अपने आप में धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता।
इसी तरह, आपराधिक साजिश के आरोप पर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का किसी लेनदेन से जुड़ा होना मात्र पर्याप्त नहीं है। साजिश के लिए ऐसा सामग्रीगत आधार होना जरूरी है, जिससे किसी गैरकानूनी काम को करने या किसी वैध काम को गैरकानूनी तरीके से करने के लिए आपसी सहमति या मिलीभगत का संकेत मिले।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि खरीद प्रक्रिया में कोई विभागीय चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी की हो सकती है। केवल इस आधार पर ठेकेदारों या आपूर्तिकर्ताओं पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
हाईकोर्ट ने पाया कि स्पेशल जज के विवादित आदेश में याचिकाकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी दिखाने वाली कोई नई सामग्री सामने नहीं आई थी। ऐसे में केवल विभागीय अनियमितताओं के आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं था।
खंडपीठ ने स्पेशल जज का 12 फरवरी 2026 का आदेश और उससे जुड़ी परिणामी कार्यवाही निरस्त की तथा आपराधिक पुनरीक्षण याचिका मंजूर की।