एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 24: एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत वारंट प्रवेश,तलाशी,अभिग्रहण और गिरफ्तार करने की शक्ति

Update: 2023-03-08 05:25 GMT

एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 42 अलग अलग तरह के अधिकारियों को बगैर वारंट के एनडीपीएस एक्ट से संबंधित अपराध की शंका के आधार पर तलाशी लेने एवं आरोपी को गिरफ्तार करने के अधिकार देती है। यह शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता में एक पुलिस अधिकारी को दी गई शक्ति की तरह ही है।

लेकिन इस धारा के अंतर्गत सरकारी विभागों के अन्य अधिकारियों को भी ऐसी शक्तियां दी गई है जो दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत एक पुलिस अधिकारी को दी गई है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 42 पर विस्तृत टिप्पणी प्रस्तुत जी जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 42

वारंट या प्राधिकार के बिना प्रवेश, तलाशी, अभिग्रहण या गिरफ्तार करने की शक्ति- (1) केन्द्रीय उत्पाद शुल्क, स्वापक, सीमा शुल्क, राजस्व आसूचना या केन्द्रीय सरकार के किसी अन्य विभाग का परा सैन्य बल या सशस्त्र बल को सम्मिलित करते हुए का ऐसा कोई अधिकारी (जो किसी चपरासी, सिपाही या कांस्टेबल की पंक्ति से वरिष्ठ अधिकारी है) जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस निमित्त सशक्त किया जाता है, अथवा किसी राज्य सरकार के राजस्व, औषधि नियंत्रण, उत्पाद शुल्क, पुलिस या किसी अन्य विभाग का ऐसा कोई अधिकारी (जो किसी चपरासी, सिपाही या कांस्टेबल की पंक्ति से वरिष्ठ अधिकारी है), जिसे राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त सशक्त किया जाता है।

यदि उसके पास व्यक्तिगत जानकारी या किसी व्यक्ति द्वारा दी गई और लिखी गई इत्तिला से यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसी कोई स्वापक औषधि या मनः प्रभावी पदार्थ या नियंत्रित पदार्थ जिसकी बाबत इस अधिनियम के अंतर्गत दण्डनीय कोई अपराध किया गया है या कोई ऐसी दस्तावेज या अन्य वस्तु जो ऐसे अपराध के किए जाने का साक्ष्य हो सकती है, जो कि इस अधिनियम के अध्याय 6क के अंतर्गत जप्ती, रोक या समपहरण करने के लिए दायी है।

उसे किसी भवन, प्रवहण या परिवेष्ठित स्थान में रखी या छिपाई गई है, तो सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच-

(क) किसी ऐसे भवन, प्रवहण या स्थान में प्रवेश कर सकेगा और उसकी तलाशी ले सकेगा;

(ख) प्रतिरोध की दशा में, किसी द्वार को तोड़ सकेगा और ऐसे प्रवेश करने में किसी अन्य बाधा को हटा सकेगा;

(ग) ऐसी औषधि या पदार्थ और उसके विनिर्माण में प्रयुक्त सभी सामग्री तथा किसी अन्य वस्तु और किसी जीवजन्तु या प्रवहण को, जिसकी बाबत उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह इस अधिनियम के अधीन अधिहरणीय है और किसी ऐसी दस्तावेज या अन्य वस्तु को, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के किए जाने का साक्ष्य हो सकती है या अवैध रुप से अर्जित कोई ऐसी संपत्ति को धारण करने बाबत साक्ष्य हो सकती जो इस अधिनियम के अध्याय 5क के अधीन जप्ती या रोक या समपहरण के लिए दायी है, अभिगृहीत कर सकेगा; और

(घ) किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि उसने इस अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय कोई अपराध किया है, निरुद्ध कर सकेगा और उसकी तलाशी ले सकेगा तथा यदि वह उचित समझे तो, उसे गिरफ्तार कर सकेगा :

परन्तु यदि ऐसे अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि तलाशी वारंट या प्राधिकार, साक्ष्य छिपाने के लिए अवसर दिए बिना या किसी अपराधी को निकल भागने के लिए सुविधा दिए बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है तो वह सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच किसी भी समय ऐसे भवन, प्रवहण या परिवेष्टित स्थान में, अपने विश्वास के आधारों को लेखबद्ध करने के पश्चात्, प्रवेश कर सकेगा और उसकी तलाशी ले सकेगा।

(2) जहां कोई अधिकारी, किसी इत्तिला को उपधारा (1) के अधीन लिखता है या अपने विश्वास के आधारों को इसके परन्तुक के अधीन लेखबद्ध करता है, वहां वह उसकी एक प्रति अपने अव्यवहित पदीय वरिष्ठ को बहत्तर घंटे के भीतर भेजेगा।

एनडीपीएस एक्ट, 1985 (1985 का 61) की धारा 67 के साथ पठित इसकी धारा 42 की उप-धारा (1) और सशस्त्र सीमा बल अधिनियम, 2007 (2007 का 53) की धारा 153 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, केन्द्र सरकार एतद्वारा सशस्त्र सीमा बल से कम से कम हैड कांस्टेबल की श्रेणी के अधिकारियों को धारा 42 और 67 में उसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत विनिर्दिष्ट शक्तियों को प्रयोग करने तथा कर्तव्यों का निर्वहन करने हेतु प्राधिकृत करती है।

इसका प्रकाशन भारत का राजपत्र (असाधारण) भाग II खण्ड 3 (ii) दिनांक 20-4-2010 पृष्ठ 1 पर किया गया है।

धारा 42 उस दशा में लागू होगी जबकि किसी भवन अथवा प्रवहन में तलाशी करना हो। जब लोकस्थल पर तलाशी व जप्ती का मामला हो तो ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 43 प्रयोज्य होगी।

जब कोई सशक्त अधिकारी अधिनियम की धारा 42 में यथावर्णित किसी पूर्व सूचना के बिना तलाशी करता है अथवा व्यक्ति की गिरफ्तारी को अन्वेषण के सामान्य अनुक्रम में करता है और इस तलाशी के पूरा होने पर एनडीपीएस एक्ट के तहत भी प्रतिषिद्ध वस्तु की बरामदगी होती है तो ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 40 के प्रावधान आकर्षित नहीं होंगे।

अधिनियम की धारा 42 (2) की भाषा से स्पष्ट है कि यह उपधारा (1) के द्वारा वर्णित अधिकारी के संबंध में प्रयोज्य होती है। यह अधिनियम की धारा 41 (2) में वर्णित राजपत्रित अधिकारी के संबंध में प्रयोज्य नहीं होती है जबकि ऐसा राजपत्रित अधिकारी स्वयं गिरफ्तारी करता है अथवा तलाशी संचालित करता है एवं जप्ती संचालित करता है।

नर्मदा प्रसाद बनाम स्टेट ऑफ एम.पी., 2001 (4) क्राइम्स 155 छत्तीसगढ़ के मामले में अधिनियम के आदेशात्मक प्रावधान का अपालन हुआ था इस बिन्दु पर विचारण न्यायालय ने विचार नहीं किया था। इस बाबत भी विचार नहीं किया था कि क्या आदेशात्मक प्रावधान के अपालन के आधार पर विचारण दूषित हो गया था व अभियुक्त को यह दर्शित करना अपेक्षित नहीं था कि जानकारी अभिलिखित न करने के कारण अथवा इसे वरिष्ठ अधिकारी को प्रस्तुत न करने के कारण एवं न्यायालय में प्रस्तुत न करने के कारण उसे कोई प्रतिकूलता हुई थी। अभियुक्त दोषमुक्त किया गया।

स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बलवीर सिंह, 1994 (3) सुप्रीम कोर्ट केस 299, स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम बाबू चक्रवर्ती, 2004 (3) क्राइम्स 378 सुप्रीम कोर्ट के मामले में अधिनियम की धारा 42 (2) के अधीन सशक्त अधिकारी जो कि लिखित में कोई जानकारी हासिल करता है अथवा अधिनियम की धारा 42 (1) के परंतुक के अधीन आधारों को अभिलिखित करता है।

उसे तत्काल इसकी एक प्रतिलिपि इसके तात्कालिक वरिष्ठ अधिकारी को भेजना चाहिए। यदि इस प्रावधान का संपूर्ण तौर पर अपालन होना पाया जाता है तो ऐसी स्थिति में अभियोजन का मामला प्रभावित होगा और इस सीमा तक यह आदेशात्मक है। परंतु यदि विलंब हुआ हो तो क्या यह असम्यक् था अथवा क्या यह स्पष्टीकृत किया गया था अथवा नहीं यह तथ्य का प्रश्न होगा।

सत्यवान पागी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 2006 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2181 बम्बई के मामले में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 43 जब्ती की शक्ति से संबंधित है एवं लोक स्थल पर गिरफ्तारी से संबंधित है। अधिनियम की धारा 42 में वर्णित विभागों में से होने वाला कोई अधिकारी को प्रतिषिद्ध वस्तु आदि की जब्ती करने के लिए सशक्त किया गया है एवं निरुद्ध करने के लिए एवं लिए किसी लोक स्थल अथवा परिवहन में किसी व्यक्ति की तलाशी अधिनियम की धारा 43 में बताए गए तत्वों के अस्तित्व होने पर करने के लिए सशक्त किया गया है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अधिनियम की धारा 42 व 43 के अधिकारी को राजपत्रित अधिकारी होना अपेक्षित नहीं करती है जबकि अधिनियम की धारा 41(2) अधिकारी को ऐसा होना अपेक्षित करती है। एक राजपत्रित अधिकारी को भिन्न तौर पर व्यवहुत किया गया है और उसमें अधिक विश्वास व्यक्त किया गया है।

इसे अधिनियम की धारा 50 से भी आंका जा सकता है जो कि व्यक्ति को राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में तलाशी करवाने के अधिकार को प्रावधानित करता है और चूंकि राजपत्रित अधिकारी स्वयं के द्वारा तलाशी व अभियुक्त की गिरफ्तारी की गई थी एवं प्रतिषिद्ध वस्तु की जब्ती की गई थी जबकि वह अधिनियम की धारा 41 के तहत कार्य कर रहा था इसलिए यह माना गया कि उसे अधिनियम की धारा 42 के प्रावधानों का अपालन करने की आवश्यकता नहीं थी।

कमलेश्वर सिंह बनाम स्टेट ऑफ एम.पी., 1997 (1) म.प्र. लॉज. 145 म.प्र के मामले में इस बात का अवधारण किया जाना था कि क्या मामले में अधिनियम की धारा 42 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ था। साक्ष्य का मूल्यांकन किया गया। मामले के तथ्य इस प्रकार के थे कि मुख्य आरक्षक ने अभियुक्त को मारुति कार में आहत दशा में पड़ा हुआ था उसके आधिपत्य में 18 किलोग्राम गाँजा था।

ऐसी स्थिति में उससे यह प्रत्याशा नहीं की जा सकती है कि अभियुक्त को व प्रतिषिद्ध वस्तु को छोड़ देगा और सशक्त अधिकारी के पास जाएगा व उसे अन्यथा अन्वेषण के लिए स्थल पर हासिल करेगा उच्च न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में जिस रीति में प्रतिषिद्ध वस्तु की जब्ती हुई थी।

उससे यह दर्शित नहीं होता था कि यह अन्वेषण की अग्रसरता में हुई थी। जब कतिपय अन्य अपराध के संबंध में अधिकारी अन्वेषण कर रहा था उस समय प्रतिषिद्ध वस्तु पाई गई थी। अधिकारी ने प्रतिषिद्ध वस्तु को जप्त कर लिया था और उसका पंचनामा बनाया था। ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि अधिनियम की धारा 42 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ था।

ज्ञानचन्द बनाम स्टेट, 2005 क्रिलॉज 3228 इलाहाबाद के प्रकरण में इस बात का अवधारण किया जाना था कि क्या धारा 42 के प्रावधान का पालन था। साक्षी ने उसके कथन में यह बताया था कि उसने लिखित में जानकारी अभिलिखित की थी और इसे डिप्टी डायरेक्टर को भेजा था। अधिनियम की धारा 42 (1) एवं 42 (2) के प्रावधान का पालन होना इस आधार पर इंकारित नहीं किया जा सकता कि कथित लिखी हुई सूचना को न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया था।

एक प्रकरण में केरल हाई कोर्ट द्वारा कहा गया है कि लिखित सूचना को न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया था ऐसा सूचनादाता की गोपनीयता बनाए रखने के लिए किया गया था। ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई थी।

विनोद कुमार बनाम एस.के. श्रीवास्तव, 2006 क्रिलॉज 1759 के मामले में अभियुक्त के अधिवक्ता के द्वारा यह तर्क दिया गया कि बरामदगी को सूर्यास्त के उपरांत व सूर्योदय के पूर्व किया गया था। अतः इस आधार पर मामला विफल होने का तर्क दिया गया था। उस बिन्दु पर अधिवक्ता ने अधिनियम की धारा 42 के प्रावधान को संदर्भित किया था।

इसके प्रतिउत्तर में शासकीय अधिवक्ता के द्वारा अधिनियम की धारा 43 की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। इस प्रावधान के अनुसार अधिनियम की धारा 42 में वर्णित किसी भी विभाग का कोई भी अधिकारी किसी लोकस्थल से जप्ती कर सकता है यह धारा सूर्योदय एवं सूर्यास्त के मारा जैसा कोई प्रतिषेध नहीं दर्शाती है। यह अभिमत दिया गया कि विधि के प्रयोजन को एडवांस किया जाना चाहिए व इधर उधर के एक-दो शब्दों के आधार पर निर्वाचन नहीं किया जा सकता है।

के.पी सलीम बनाम स्टेट ऑफ केरल, 2001 क्रिलॉज 4364 केरल के मामले में कहा गया है कि अब यह सुस्थापित विधि है कि एनडीपीएस एक्ट के प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान के पूरक मात्र है और यह उनके न्यूनीकरण में नहीं है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 43 के अंतर्गत निजी व्यक्ति भी व्यक्ति की गिरफ्तारी कर सकता है यदि वह गैर जमानती व संज्ञेय अपराध को कारित करने में निरुद्ध होना पाया जाता है।

इस समान प्रावधान के अधीन गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति को इस प्रकार गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस अधिकारी को सुपुर्द करने का अधिकार होता है। इस परिस्थिति को दृष्टिगत रखते हुए जब स्थानीय क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों ने अभियुक्त जो कि ब्राउन शुगर को तैयार करने में नियोजित होना पाया गया था यदि गिरफ्तार कर लिया हो तो इसे उचित माना जाएगा।

एक प्रकरण में अधिनियम की धारा 42 (2) के अधीन वरिष्ठ अधिकारीगण को जानकारी भेजने की अपेक्षा का आग्रह किन मामलों में नहीं किया जा सकता है स्पष्ट किया गया। यह अभिमत दिया गया कि विधान में ऐसा कोई वर्जन नहीं है कि राजपत्रित रैंक के अधिकारीगण स्वयं गिरफ्तारी तलाशी एवं जब्ती के कृत्य को नहीं कर सकते जब ये स्वयं ऐसे कृत्य को करते हैं तो उन्हें ऐसी बातों के संबंध में उनके वरिष्ठों को रिपोर्ट करने की आवश्यकता नहीं होती है।

स्टेट ऑफ एम.पी. बनाम नाथूलाल, 2001 क्रिलॉज 42 एन.ओ.सी. 2001 के मामले में अभियुक्त के द्वारा अपराध करने से इंकार किया गया था। अभियुक्तगण की प्रतिरक्षा यह थी कि पुलिस ने प्रतिषिद्ध वस्तु को ग्राउण्ड में "अनक्लेम्ड प्रॉपर्टी" के रूप में होना पाया गया था और जब अभियुक्तगण उस स्थल से गुजरे थे तो उन्हें गिरफ्तार कर बुरी तरह पीटा गया था। अभियुक्त की प्रतिरक्षा संभाव्य मानी गई अभियुक्तगण के विरुद्ध अपराध अप्रमाणित माना गया।

स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम जर्नेल सिंह, 2004 (3) क्राइम्स 25 सुप्रीम कोर्ट के मामले में वाहन की तलाशी करने पर हुई थी। ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 50 के प्रावधान प्रयोज्य नहीं होंगे। बरामदगी लोकस्थल पर हुई थी। ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 42 के प्रावधानों का पालन किया जाना भी अपेक्षित नहीं माना गया। मामला अधिनियम की धारा 43 से शासित होना माना गया जो ऐसी किसी अपेक्षा को प्रतिपादित नहीं करती है।

यह भी स्पष्ट किया गया कि पुलिस अधीक्षक तलाशी दल का सदस्य था और वह अधिनियम की धारा 41 के तहत प्राधिकार का उपयोग कर रहा था। ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 42 का परंतुक आकर्षित नहीं होगा। परिणामतः शासन के द्वारा प्रस्तुत की गई दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील मंजूर कर ली गई। अभियुक्त को अधिनियम की धारा 15 के तहत दोषी होना माना गया।

स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम बाबू चक्रवर्ती, 2004 (3) क्राइम्स 378 सुप्रीम कोर्ट के मामले में अधिनियम की धारा 42 (2) के प्रावधान का उल्लंघन हुआ था। तलाशी को रात्रि 9.45 बजे सूर्यास्त के उपरांत व सूर्योदय के पूर्व अधिनियम की धारा 42 (1) के परंतुक का पालन किए बिना किया गया था। ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 42 (1) व अधिनियम की धारा 42 (1) के परंतु का पालन होना नहीं माना गया अधिनियम की धारा 42(1) का परंतुक यह अपेक्षा करता है कि जहां अधिकारी को यह विश्वास करने का कारण है कि तलाशी वारंट अथवा प्राधिकार को साक्ष्य को दबाए जाने के अवसर को प्रदान किए बिना हासिल नहीं किया जा सकता है अथवा अपराधी को बचने की सुविधा प्रदान किए बिना हासिल नहीं किया जा सकता है तो वह ऐसे भवन, प्रवहण अथवा परिषद्ध स्थल में सूर्यास्त एवं सूर्योदय के मध्य उसके विश्वास के कारणों को अभिलिखित करने के उपरांत प्रवेश कर सकता है।

इस संबंध में दी गई साक्ष्य का परिशीलन किया गया था। अभियोजन साक्षी 4 अथवा अभियोजन साक्षी 2 ने यह वर्णित नहीं किया था कि उसके द्वारा अधिनियम की धारा 42 (1) धारा 42 (1) के परंतुक एवं धारा 42 (2)क के अधीन प्रक्रिया का पालन तलाशी लिए जाने के पूर्व किया गया था। इन साक्षीगण के द्वारा यह बताया गया कि तलाशी लिए जाने पर कतिपय पॉलिथिन बैग जिनमें कि हेरोइन थी बरामद हुए थे।

इन साक्षीगण के अनुसार स्थानीय क्षेत्र के 2 स्वतंत्र साक्षीगण को प्राप्त किया गया था और वे तलाशी के साक्षी हुए थे परंतु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही कि इन साक्षीगण का परीक्षण नहीं कराया गया था और न ही विचारण में उन्हें आहूत किए जाने का कोई प्रयास किया गया था। अभियोजन साक्षी 2 से प्रतिपरीक्षण में विनिर्दिष्ट प्रश्न पूछे जाने पर उसने यह अभिसाक्ष्य दी थी कि कोई जब्ती पत्रक तैयार नहीं किया गया था एवं अभियोजन साक्षी 4 ने बताया था कि उसे यह ज्ञात नहीं है कि क्या कोई तलाशी पत्रक तैयार किया गया था। दोषमुक्ति उचित मानी गई।

सुरजाराम बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान, 2004 (3) क्राइम्स 688 राजस्थान) के मामले में अधिनियम की धारा 42(2) के प्रावधानों का अपालन होना पाया गया था। इसे स्टेशन हाउस ऑफिसर ने उसके प्रतिपरीक्षण में यह मंजूर किया था कि प्रदर्श पी-8 के पत्रक में यह नहीं बताया गया था कि मुखबिर की जानकारी को वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा गया था।

अधिनियम की धारा 42 (2) में अंतर्निहित प्रावधान की प्रकृति आदेशात्मक स्वरुप की मानी गई। इसका अपालन होने पर अभियोजन कथा की उचितता पर संदेह उत्पन्न होता है। यह माना गया कि अभियोजन यह प्रमाणित करने में विफल रहा था कि अभियुक्त के आधिपत्य से पोस्त भूसी की बरामदगी हुई थी। अभियुक्त के विरुद्ध युक्तियुक्त संदेह से परे अधिनियम की धारा 8/15 के तहत मामला प्रमाणित होना नहीं पाया गया।

गुरुचरणसिंह बनाम स्टेट ऑफ एम.पी., 1992 (1) म.प्र.वी. नो. 53 म.प्र के प्रकरण में इस आशय का तर्क दिया गया था कि अधिनियम की धारा 41 व 42 के आदेशात्मक प्रावधानों का पालन नहीं किया गया था। एएसआई जिसके द्वारा जानकारी प्राप्त की गयी थी वह नाम अभिलिखित करने में विफल रहा था। इस तथ्य को उसने न्यायालय के समक्ष दिए गए कथन में मंजूर किया था।

अभियुक्त के अधिवक्ता के द्वारा न्याय दृष्टांत स्टेट ऑफ बिहार बनाम कपिल सिंह, एआईआर 1969 सुप्रीम कोर्ट 53 के पद 10 पर निर्भरता व्यक्त करते हुए यह तर्क दिया गया कि ढाबा में प्रविष्ट होने के पूर्व पुलिसजन ने एवं तलाशी दल में साथ होने वाले साक्षीगण ने उनकी खुद की तलाशी नहीं दी थी। श्री आरएससिंह, अमरसिंह व मुख्य आरक्षक की साक्ष्य से यह स्पष्ट था कि अभियुक्त को मिथ्या लिप्त किए जाने की संभावना को दूर करने के लिए परिकल्पित विधिक अपेक्षाओं का पालन नहीं किया गया था।

यह तर्क दिया गया कि अधिनियम की धारा 50 के तहत तलाशी संचालित करने वाले पुलिस अधिकारी के लिए यह आबद्धकारी था कि वह अभियुक्त को राजपत्रित अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में तलाशी करवाए जाने के विकल्प को चुनने के अधिकार से अवगत कराता। अभियोजन साक्ष्य से यह स्पष्ट था कि अभियुक्त को ऐसी कोई सूचना नहीं दी गई और इस कारण वह कथित प्रावधान के अधीन उसके विकल्प का उपयोग नहीं कर सका था। इस प्रकार यह तर्क दिया गया कि आक्षेपित दोषसिद्धि करने में गंभीर दुर्बलता थी।

परिणामतः दोषसिद्धि व दंडादेश स्थिर रखने योग्य नहीं है। इन लचरताओं को स्पष्ट नहीं किया जा सका था। अभियोजन का मामला किसी एक दुर्बलता से ग्रसित नही था अपितु अधिनियम की धारा 41, 42 व 50 के प्रावधान के उल्लंघन के रुप में गंभीर दुर्बलताएँ थीं। महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि अभियुक्त के पेंट की जेब से प्रतिषिद्ध वस्तु की बरामदगी हुई थी परन्तु यह तथ्य जब्ती पत्रक में वर्णित नहीं था।

हाईकोर्ट ने व्यक्त किया कि इस तरह के मामलों में जहां कि 10 वर्ष के निरोध की सजा हो व 1,00,000 रुपए के जुर्माने को अधिरोपित किया जा सकता हो, जांच करने वाले अधिकारी से प्रक्रियात्मक आबद्धताओं के प्रति पूरी तौर पर सजग व निष्ठापूर्ण होने की प्रत्याशा की जाती है। ऊपर इंगित दुर्बलताओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि अभियुक्त को उसकी प्रतिरक्षा में सारवान प्रतिकूलता हुई थी। परिणामतः अभियुक्त को दोषी माने जाने से अनिच्छा व्यक्त की गई।

अब्दुल रसीद इब्राहीम बनाम स्टेट ऑफ गुजरात, 2000 (2) सुप्रीम कोर्ट केस 513 के मामले में तलाशी कार्यवाही को पुलिस इंस्पेक्टर के द्वारा किया गया था जो कि स्वीकृत तौर पर जानकारी को अधिनियम की धारा 42 (1) के द्वारा यथा अपेक्षित तौर पर लिखित तौर लिखने में विफल रहा था और वह जानकारी की सूचना को अधिनियम की धारा 42(2) की यथा अपेक्षा अनुसार उसके तात्कालिक वरिष्ठ अधिकारी को भेजने में विफल रहा था। इस पुलिस इंस्पेक्टर की प्रास्थिति राजपत्रित रैंक के अधिकारी की नहीं थी। इसलिए अधिनियम की धारा 42 के प्रावधानों का पालन करना उसके लिए आवश्यक था। चूंकि वह ऐसा करने में विफल रहा था अतः अभियुक्त की दोषसिद्धि इस मामले में अपास्त की गई।

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