जमानती अपराधों में बरी होने के खिलाफ अपील सिर्फ़ हाईकोर्ट में होती है, सेशंस कोर्ट में नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक सेशंस कोर्ट द्वारा दिए गए दोषसिद्धि का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को लापरवाही से मौत का कारण बनने का दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी के आदेश को चुनौती देते हुए सेशंस कोर्ट में गलत तरीके से अपील दायर की थी, जबकि सेशंस कोर्ट के पास ऐसी अपील पर सुनवाई करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
अपीलकर्ता, के. केशवा ने सेशंस कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसने ट्रायल कोर्ट के बरी होने के खिलाफ राज्य की अपील को स्वीकार कर लिया। सेशंस कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279, 337, 338 और 304-A के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि जब जमानती अपराधों के संबंध में बरी होने का फैसला सुनाया जाता है तो जिला और सेशन जज के पास अपील पर सुनवाई करने का कोई अधिकार नहीं होता। यह तर्क दिया गया कि ऐसे बरी होने के मामले आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 378 की उप-धारा (1) के खंड (a) के तहत नहीं आते हैं। नतीजतन, पहली अपीलीय अदालत द्वारा दिया गया फैसला अमान्य था।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि पहली अपीलीय अदालत का फैसला योग्यता के आधार पर दिया गया, न्यायसंगत और उचित है। इसलिए इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस जी. बसवराजा ने कहा,
आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 378 में संशोधन को देखते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए बरी के आदेश के खिलाफ अपील सेशंस कोर्ट में तभी होती है, जब अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हो। अन्य सभी मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए बरी के खिलाफ अपील हाईकोर्ट में होती है। चूंकि धारा 279, 337, 338 और 304-A IPC के तहत कथित अपराध जमानती प्रकृति के हैं, इसलिए राज्य को हाई कोर्ट में अपील करनी चाहिए।
कोर्ट ने आगे कहा कि सम्मानित अतिरिक्त राज्य लोक अभियोजक यह दिखाने में विफल रहे कि जमानती अपराधों के संबंध में बरी होने के खिलाफ अपील सेशंस कोर्ट में कैसे सुनवाई योग्य थी।
कोर्ट ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 378 की उप-धारा (1) के खंड (b) को देखते हुए, ऐसी अपील सेशंस कोर्ट में नहीं होती है। अधिकार क्षेत्र की अवधारणा पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिकार क्षेत्र में पार्टियों, विषय वस्तु और तय किए गए मामलों पर कोर्ट का अधिकार शामिल होता है। कोर्ट ने कहा कि सेशंस कोर्ट का आदेश साफ़ तौर पर अधिकार क्षेत्र से बाहर था, और ऐसी कार्यवाही जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, साथ ही यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन भी होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकार क्षेत्र को अप्रत्यक्ष रूप से नहीं माना जा सकता है। न्याय में अन्याय को रोकने के लिए अधिकार क्षेत्र की ज़्यादातियों को ठीक करने के लिए स्वाभाविक शक्तियों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
अपील को मंज़ूर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उसे ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं मिली। कोर्ट ने आगे कहा कि पहली अपीलीय अदालत बरी करने के फैसले को पलटने के लिए सही कारण बताने में विफल रही।
Case Title: K Keshava AND State of Karnataka