रिश्ता किसी की गरिमा से खिलवाड़ का लाइसेंस नहीं: झारखंड हाइकोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार

Update: 2026-01-29 07:03 GMT

झारखंड हाइकोर्ट ने ऐसे व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की, जिस पर आरोप है कि उसने एक महिला के नाम से फर्जी ई-मेल और सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर उसकी आपत्तिजनक और मानहानिकारक सामग्री उसके नियोक्ता को भेजी। आरोपी महिला के साथ कथित रूप से सहमति से बने अतिरिक्त वैवाहिक संबंध में था।

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की पीठ साइबर थाना कांड संख्या 14/2025 से संबंधित अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई।

हाइकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रकार का संबंध मौजूद भी हो, तो उसे साधारण मित्रता नहीं कहा जा सकता, जब एक पक्ष दूसरे की गरिमा और निजता का शोषण करे।

न्यायालय ने कहा कि आरोपी को यह अधिकार नहीं है कि वह शिकायतकर्ता की गरिमा और निजता से समझौता करे।

अभियोजन के अनुसार आरोपी और शिकायतकर्ता की मुलाकात अक्टूबर 2021 में रांची स्थित फ्रैंकफिन इंस्टिट्यूट में हुई, जहां आरोपी अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत था। दोनों के बीच निकटता बढ़ी और संबंध स्थापित हुए। बाद में आरोपी ने कथित रूप से शिकायतकर्ता की पहचान का दुरुपयोग करते हुए फर्जी ई-मेल और इंस्टाग्राम अकाउंट बनाए और आपत्तिजनक तस्वीरें प्रसारित कीं।

राज्य सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि आरोपी ने शिकायतकर्ता के वर्तमान कार्यस्थल, एमिटी यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को भी आपत्तिजनक सामग्री भेजी, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और नौकरी को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया।

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी ने कथित रूप से 25 लाख रुपये की मांग की थी और राशि न देने पर सामग्री प्रसारित करने की धमकी दी गई।

वहीं आरोपी ने दलील दी कि प्राथमिकी दुर्भावनापूर्ण है, संबंध सहमति से थे और मामला निजी रंजिश का परिणाम है। उसने प्राथमिकी दर्ज करने में देरी का भी मुद्दा उठाया।

हालांकि, हाइकोर्ट ने केस डायरी और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अवलोकन करते हुए कहा कि आरोपी का आचरण केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने शिकायतकर्ता की गरिमा और निजता को गंभीर रूप से ठेस पहुंचाई है।

जस्टिस द्विवेदी ने कहा कि यह तर्क स्वीकार्य नहीं है कि शिकायतकर्ता विवाहित होने के कारण पूरी तरह दोषी ठहराई जाए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने यह मानते हुए कि आरोपी को अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं है, उसकी याचिका खारिज कर दी।

Tags:    

Similar News