नाबालिग थैलेसीमिया मरीजों को HIV संक्रमित खून चढ़ाने के आरोप पर FIR की मांग, झारखंड हाईकोर्ट में याचिका

Update: 2026-01-14 10:00 GMT

झारखंड हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि अक्टूबर 2025 में पश्चिम सिंहभूम जिले के चाईबासा सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में थैलेसीमिया से पीड़ित नाबालिग बच्चों को HIV संक्रमित रक्त चढ़ाया गया। याचिका में इस घटना को लेकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एम. शादाब अंसारी ने बताया कि पीड़ित बच्चे थैलेसीमिया नामक आजीवन रहने वाली आनुवंशिक रक्त बीमारी से पीड़ित हैं, जिसके इलाज के लिए उन्हें नियमित रूप से रक्त चढ़ाना पड़ता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चाईबासा सदर अस्पताल में इलाज के दौरान बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाया गया।

याचिकाकर्ताओं ने इसे गंभीर चिकित्सा लापरवाही बताते हुए कहा है कि यह मिलावटी/अमानक रक्त की आपूर्ति का मामला है, जिससे बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पैदा हुआ है। उन्होंने कहा कि यह घटना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, HIV और AIDS (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत अपराध बनती है।

हालांकि राज्य सरकार ने कथित तौर पर इस मामले में लापरवाही स्वीकार करते हुए कुछ अधिकारियों को निलंबित किया है, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसके बावजूद अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है, जबकि पीड़ित परिवारों ने शिकायतें की हैं। उनका आरोप है कि पुलिस ने ऐसे मामलों में आवश्यक आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की, जबकि यह मामला संज्ञेय अपराधों से जुड़ा है, जिसमें मिलावटी दवाओं और मानव जीवन को खतरे में डालने जैसे अपराध शामिल हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि पीड़ित बच्चे हाशिए पर रहने वाले आदिवासी समुदायों से आते हैं और उनके परिवारों को सामाजिक कलंक, आर्थिक संकट और जीवन की पूर्ण अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार द्वारा घोषित ₹2 लाख का मुआवजा आजीवन इलाज और पुनर्वास के लिए अपर्याप्त बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि यह मामला झारखंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, विशेषकर ब्लड बैंक प्रबंधन की प्रणालीगत विफलताओं को उजागर करता है।

याचिकाकर्ताओं ने अन्य राहतों के साथ-साथ हाईकोर्ट की निगरानी में एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने की मांग की है, ताकि निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो सके और सभी जिम्मेदार व्यक्तियों एवं संस्थाओं की आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सके।

याचिका में कुछ महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी उठाए गए हैं, जैसे—

क्या धारा 173 BNSS (जो धारा 154 CrPC के समकक्ष है) के तहत पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज न करना उसकी कानूनी जिम्मेदारी का उल्लंघन है?

क्या यह मामला ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 27 के तहत अपराध बनता है?

और क्या हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत एफआईआर दर्ज कराने और SIT के माध्यम से जांच की निगरानी करने का अधिकार रखता है, विशेषकर जब पीड़ित नाबालिग और अत्यंत संवेदनशील वर्ग से हों?

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