NI Act की धारा 138 मामलों में पूर्व-संज्ञान सुनवाई अनिवार्य नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में अहम फैसला देते हुए कहा कि परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत कार्यवाही में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के अंतर्गत पूर्व-संज्ञान (प्री-कॉग्निजेंस) स्तर पर आरोपी को सुनवाई देना अनिवार्य नहीं है।
हाइकोर्ट ने इसी आधार पर कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चेक बाउंस की शिकायत दर्ज होने के बाद आरोपी द्वारा सिविल मुकदमा या समानांतर आपराधिक कार्यवाही शुरू करना वैधानिक अभियोजन को पटरी से उतारने का जरिया नहीं बन सकता।
याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी द्वारा NI Act की धारा 138 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को यह कहते हुए चुनौती दी कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण है और उसके 45 लाख रुपये के वैध धन दावे के जवाब में काउंटरब्लास्ट के तौर पर दायर की गई।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वह पहले ही उक्त राशि की वसूली के लिए सिविल वाद दायर कर चुका है और प्रतिवादी के खिलाफ निजी आपराधिक शिकायत भी दर्ज कराई।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि जब ट्रायल कोर्ट ने शुरू में BNSS की धारा 223 के तहत पूर्व-संज्ञान सुनवाई प्रदान की थी तो बाद में उस सुनवाई को समाप्त नहीं किया जा सकता। इस कारण संज्ञान लेने का आदेश अवैध है।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी ने 4 जून, 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट, कटरा के समक्ष NI Act की धारा 138 के तहत शिकायत दायर की थी। प्रारंभ में ट्रायल कोर्ट ने BNSS की धारा 223 के तहत पूर्व-संज्ञान सुनवाई की बात कही थी।
हालांकि, 29 अक्टूबर 2025 के आदेश से कोर्ट ने यह संतुष्टि दर्ज करते हुए संज्ञान ले लिया कि संबंधित चेक बाउंस हो चुके हैं और वैधानिक कानूनी नोटिस विधिवत रूप से भेजा और प्राप्त किया गया।
इस बीच याचिकाकर्ता ने 1 सितंबर, 2025 को जिला जस्टिस, उधमपुर की अदालत में सिविल रिकवरी सूट दायर किया और 29 अगस्त, 2025 को भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 115, 126 और 352 के तहत प्रतिवादी के खिलाफ निजी आपराधिक शिकायत भी दाखिल की।
हाइकोर्ट का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के फैसले संजाबीजी तारी बनाम किशोर एस. बोरकर (2025) पर भरोसा करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि NI Act की धारा 138 के तहत कार्यवाही एक विशेष कानून द्वारा शासित होती है। ऐसे मामलों में BNSS की धारा 223 के तहत आरोपी को पूर्व-संज्ञान सुनवाई देने की आवश्यकता नहीं रहती।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि जब धारा 138 के आवश्यक तत्व चेक का जारी होना, उसका अनादर, वैधानिक नोटिस की सेवा और भुगतान में विफलता प्रथम दृष्टया स्थापित हो जाते हैं तो ट्रायल कोर्ट को संज्ञान लेने का पूरा अधिकार है।
नोटिस की सेवा न होने के तर्क को भी हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि डाक रसीदें स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि नोटिस उसी पते पर भेजा गया, जहां से याचिकाकर्ता पहले अपने वकील के माध्यम से पेश होकर आपत्तियां दाखिल करने के लिए समय मांग चुका था।
सुनवाई से वंचित किए जाने की दलील को भी रिकॉर्ड के विपरीत बताते हुए खारिज कर दिया गया।
हाइकोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की भौतिक उपस्थिति उसके वकील द्वारा जानबूझकर टाली गई।
इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।