दुष्कर्म के मामलों में सुनवाई की समयसीमा 'पीड़ित के न्याय' के लिए, आरोपी को खुद-ब-खुद जमानत मिलने का आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

Update: 2026-01-19 09:35 GMT

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 309 के तहत दुष्कर्म के मुकदमों को दो महीने में पूरा करने का प्रावधान पीड़िता को 'त्वरित न्याय' दिलाने के लिए बनाया गया। इसे आरोपी द्वारा देरी के आधार पर 'ऑटोमैटिक बेल' (स्वचालित जमानत) पाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय धर की पीठ ने एक 13 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी दो व्यक्तियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

क्या थी आरोपी की दलील

आरोपियों (जिनकी उम्र 28 और 32 वर्ष है) की ओर से वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 309 के प्रावधान के अनुसार, दुष्कर्म से संबंधित अपराधों की जांच या सुनवाई आरोप पत्र दाखिल होने के दो महीने के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। चूंकि इस मामले में ट्रायल कोर्ट निर्धारित समयसीमा के भीतर कार्यवाही पूरी करने में विफल रहा, इसलिए आरोपी तकनीकी आधार पर जमानत के हकदार हैं।

हाइकोर्ट का कड़ा रुख

जस्टिस संजय धर ने इन दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कानून की मंशा अपराधियों को लाभ पहुंचाना नहीं बल्कि पीड़ितों को राहत देना है।

कोर्ट ने कहा,

"विधायिका द्वारा इन अपराधों के त्वरित विचारण (Trial) का प्रावधान करने का उद्देश्य पीड़ितों को जल्द न्याय सुनिश्चित करना है। विधायिका द्वारा दिया गया यह आदेश आरोपी के लाभ के लिए नहीं हो सकता।"

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 167 (जहां जांच में देरी पर 'डिफ़ॉल्ट बेल' मिलती है) और धारा 309 के तहत ट्रायल की समयसीमा में बड़ा अंतर है। धारा 309 में समयसीमा बीत जाने पर आरोपी को स्वतः रिहा करने का कोई कानूनी तंत्र मौजूद नहीं है।

मामले की गंभीरता पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस धर ने कहा कि यह कोई 'टीनएज लव' का मामला नहीं है, बल्कि दो वयस्क पुरुषों द्वारा एक 13 साल की बच्ची के साथ की गई दरिंदगी है। कोर्ट ने इसे 'विकृत मानसिकता' वाला जघन्य अपराध करार दिया। अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता और उसकी बहन (जो चश्मदीद गवाह है) ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष का समर्थन किया, ऐसे में आरोपियों को बाहर छोड़ना पीड़िता को डराने और न्याय को प्रभावित करने जैसा होगा।

कानूनी वैधता पर मुहर

याचिकाकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र और विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने इन सभी आपत्तियों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सरकार ने 2018 में ही हर जिले के प्रिंसिपल सेशन जज को 'पोक्सो (POCSO) विशेष अदालत' के रूप में नामित कर दिया।

अदालत का निष्कर्ष

हाइकोर्ट ने कहा कि चूंकि POCSO Act की धारा 29 और 30 के तहत अपराध की धारणा आरोपी के खिलाफ है और मुकदमे की प्रगति संतोषजनक है। इसलिए जमानत का कोई आधार नहीं बनता।

Tags:    

Similar News