पूर्वक्रय का अधिकार अत्यंत कमजोर बिना दावा किए निषेधाज्ञा वाद दायर करना अधिकार का परित्याग माना जाएगा: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्वक्रय (प्री-एम्पशन) का अधिकार एक अत्यंत कमजोर अधिकार है, जिसे खरीदार विधिसम्मत तरीकों से विफल कर सकता है और जिसे पूर्वक्रेता अपने आचरण के माध्यम से भी त्याग सकता है।
हाइकोर्ट ने वर्ष 2001 में जिला जज, पुंछ द्वारा पारित उस निर्णय और डिक्री को निरस्त कर दिया, जिसमें वादी के पक्ष में पूर्वक्रय अधिकार लागू करते हुए संपत्ति का कब्जा 40,000 के भुगतान पर सौंपने का आदेश दिया गया।
जस्टिस संजय धर ने कहा कि यदि कोई पूर्वक्रेता बिक्री की जानकारी होने के बावजूद केवल स्थायी निषेधाज्ञा का वाद दायर करता है। उसमें पूर्वक्रय अधिकार का दावा नहीं करता तो ऐसा आचरण उसके अधिकार के परित्याग के रूप में माना जाएगा। ऐसे मामलों में साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 के तहत निषेध (एस्टॉपल) लागू होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील जिला जज, पुंछ के उस आदेश के विरुद्ध दायर की गई, जिसमें उत्तरदाता-वादी के पक्ष में पूर्वक्रय अधिकार स्वीकार करते हुए उसे वादग्रस्त संपत्ति का कब्जा दिए जाने का निर्देश दिया गया। अपीलकर्ता-खरीदार ने इस आदेश को हाइकोर्ट में चुनौती दी।
अपीलकर्ता की ओर से वकील के.एल. पंडिता ने दलील दी कि वादी ने अपने आचरण से पूर्वक्रय अधिकार का परित्याग कर दिया था। बिक्री विलेख निष्पादित होने के बाद वादी ने केवल अतिक्रमण रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा का वाद दायर किया, जबकि उसे बिक्री की पूरी जानकारी थी फिर भी उसने पूर्वक्रय अधिकार का दावा नहीं किया।
यह भी कहा गया कि वादी ने वह वाद आगे नहीं बढ़ाया और इसी दौरान अपीलकर्ता ने संपत्ति में तोड़फोड़ व निर्माण संबंधी परिवर्तन भी किए।
वहीं वादी की ओर से वकील मेहरूख सैयदान ने तर्क दिया कि पूर्वक्रय अधिकार जम्मू-कश्मीर पूर्वक्रय अधिनियम के तहत प्राप्त वैधानिक अधिकार है, जिसे आचरण या स्वीकारोक्ति के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
हाइकोर्ट की टिप्पणियां
हाइकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या वादी ने अपने आचरण से पूर्वक्रय अधिकार का परित्याग किया है। इस पर जस्टिस संजय धर ने पूर्वक्रय अधिकार की प्रकृति पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि यह संपत्ति पर अधिकार नहीं बल्कि केवल “स्थानापन्न होने का अधिकार” है, जिसके तहत पूर्वक्रेता खरीदार के स्थान पर आ सकता है।
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बिशन सिंह बनाम खज़ान सिंह और बरसात आई हॉस्पिटल बनाम कौस्तुभ मंडल मामलों का हवाला देते हुए कहा कि पूर्वक्रय अधिकार को खरीदार विधिसम्मत तरीकों से पराजित कर सकता है और पूर्वक्रेता अपने आचरण से भी इसे त्याग सकता है।
कोर्ट ने पाया कि वादी ने अधिनियम की धारा 19 के तहत नोटिस देने के बाद भी 3 जून, 1987 को केवल निषेधाज्ञा का वाद दायर किया और जानबूझकर पूर्वक्रय अधिकार लागू करने की मांग नहीं की। इससे अपीलकर्ता को यह विश्वास हुआ कि वादी ने बिक्री को स्वीकार कर लिया है।
हाइकोर्ट ने इसे मौन स्वीकृति द्वारा निषेध का स्पष्ट मामला बताते हुए कहा कि निचली अदालत ने इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी की।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 38 वर्षों से संपत्ति पर काबिज अपीलकर्ता को मात्र 40,000 की राशि पर संपत्ति खाली करने को कहना गंभीर अन्याय होगा। हाइकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पूर्वक्रय अधिकार संपत्ति के संवैधानिक अधिकार को प्रभावित करता है और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद संबंधित अधिनियम भी निरस्त हो चुका है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली ट्रायल कोर्ट का निर्णय निरस्त कर दिया और वादी द्वारा जमा की गई राशि वापस करने का आदेश दिया।