सीनियर ऑफिसर की पत्नी के साथ अफेयर के लिए ITBP कॉन्स्टेबल को नौकरी से निकालना बहुत कड़ी सज़ा, अनिवार्य रिटायरमेंट सही: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-06-23 04:37 GMT

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि ITBP के कॉन्स्टेबल को अपने सीनियर ऑफिसर की पत्नी के साथ आपसी सहमति से अवैध संबंध बनाने के लिए नौकरी से निकालने की सज़ा, इस मामले के खास हालात को देखते हुए बहुत ज़्यादा है।

कोर्ट ने गौर किया कि सीनियर ऑफिसर के खिलाफ भी अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई और वह अपने लैपटॉप पर सेक्सुअल एक्ट रिकॉर्ड करने का दोषी पाया गया, लेकिन उसे बहुत कम सज़ा मिली। इसलिए कोर्ट ने कॉन्स्टेबल को नौकरी से निकालने की सज़ा को बदलकर अनिवार्य रिटायरमेंट किया और कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में समानता और सज़ा का सही अनुपात (proportionality) नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की डिवीज़न बेंच ने कहा:

"जब सीनियर ऑफिसर को अपने लैपटॉप की मदद से सीडी बनाने और अपने जूनियर को गलत काम करने के लिए मजबूर करने का दोषी ठहराया जा चुका है तो मौजूदा अपीलकर्ता को नौकरी से निकालने जैसी कड़ी सज़ा नहीं दी जा सकती।"

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता लेह में तैनाती के दौरान असिस्टेंट कमांडेंट अविनाश सिंह के सिक्योरिटी असिस्टेंट के तौर पर काम कर रहा था। उस दौरान, उसके ऑफिसर की पत्नी के साथ आपसी सहमति से संबंध बन गए। ऑफिसर की पत्नी की शिकायत के बाद इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस फोर्स एक्ट, 1992 के तहत कॉन्स्टेबल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई। एक समरी फोर्स कोर्ट ने उसे अच्छे अनुशासन और व्यवस्था के खिलाफ आचरण का दोषी पाया और जून 2010 में उसे नौकरी से निकालने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट के सामने कॉन्स्टेबल ने गलत आचरण के निष्कर्षों पर कोई विवाद नहीं किया और अपनी चुनौती को केवल सज़ा की मात्रा तक सीमित रखा। कोर्ट ने दोहराया कि अनुशासनात्मक मामलों में न्यायिक समीक्षा सीमित होती है और सज़ा में दखल तभी ज़रूरी होता है जब सज़ा साबित हुए गलत आचरण की तुलना में बहुत ज़्यादा हो।

समानुपातिकता के सिद्धांत (doctrine of proportionality) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का ज़िक्र करते हुए बेंच ने कहा कि कोर्ट उन हालात की जांच कर सकती है, जिनमें गलत आचरण हुआ, ताकि यह तय किया जा सके कि दी गई सज़ा बहुत ज़्यादा तो नहीं है।

कोर्ट ने गौर किया कि अपीलकर्ता असिस्टेंट कमांडेंट अविनाश सिंह के कमांड के तहत काम करने वाला कॉन्स्टेबल था और उनके सरकारी आवास पर तैनात था। कोर्ट ने यह भी देखा कि अपीलकर्ता का लगातार यही कहना था कि संबंध सीनियर ऑफिसर के कहने पर बने थे और जब उसने विरोध करने की कोशिश की, तो उसे कानूनी कार्रवाई की धमकी दी गई।

बेंच ने एक अहम बात पर ध्यान दिया कि असिस्टेंट कमांडेंट अविनाश सिंह के खिलाफ भी अलग से कार्रवाई शुरू की गई। इस अधिकारी पर आरोप था कि उसने अपनी पत्नी को अपीलकर्ता के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया और इस यौन क्रिया को अपने लैपटॉप पर रिकॉर्ड किया। पहला आरोप तो साबित नहीं हो सका, लेकिन दूसरा आरोप साबित हो गया, जिसके कारण पेंशन के मकसद से उसकी दो साल की पिछली सेवा ज़ब्त करने की सज़ा दी गई।

कोर्ट ने देखा कि दोनों कार्यवाहियों में अधिकारी की पत्नी के बयान काफी हद तक एक जैसे थे और उसने आरोप लगाया कि उसके पति ने ही उसे इन कामों के लिए मजबूर किया और उन्हें रिकॉर्ड किया। बेंच ने यह भी गौर किया कि सीनियर अधिकारी को इस रिश्ते के बारे में पता होने के बावजूद, उसने इन घटनाओं के बाद भी अपीलकर्ता को अपने साथ बनाए रखा और खुद भी इन कामों को रिकॉर्ड करने का दोषी पाया गया।

बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि यह गलत व्यवहार "बहुत ही घिनौना" था और अनुशासन सशस्त्र बलों की रीढ़ होता है, फिर भी नौकरी से हटाने की सज़ा को अनिवार्य रिटायरमेंट में बदलकर न्याय के मकसद को पूरा किया जा सकता है। इसलिए कोर्ट ने सज़ा के हद तक नौकरी से हटाने और अपील खारिज करने के आदेशों को रद्द किया और निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को सभी संबंधित लाभों के साथ अनिवार्य रूप से रिटायर माना जाए।

Case Name: Ashwani Kumar v. Union of India & Ors.

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