राज्य, काम पर वापस बुलाए गए कर्मचारी को उसकी पिछली नौकरी के दौरान मिल रहे पूरे वेतन का लाभ देने से इनकार नहीं कर सकता: एचपी हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य, काम पर वापस बुलाए गए कर्मचारी को उसकी पिछली नौकरी के दौरान मिल रहे पूरे वेतन का लाभ देने से इनकार नहीं कर सकता। साथ ही कर्मचारी को नुकसान पहुँचाते हुए, उसे वापस काम पर रखने के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका बहुत देर से दायर करके राज्य अपनी ही गलती का फ़ायदा नहीं उठा सकता।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज की, जिसमें सिंगल जज के आदेश को चुनौती दी गई। उस आदेश में राज्य को निर्देश दिया गया कि वह एक दिहाड़ी वाले वन कर्मचारी को लेबर कोर्ट के वापस काम पर रखने के फ़ैसले की तारीख से 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947' की धारा 17-B के तहत पिछली नौकरी के दौरान मिल रहा पूरा वेतन दे।
कोर्ट ने राज्य की इस दलील को खारिज किया कि यह लाभ केवल उस तारीख से मिलना चाहिए, जब कर्मचारी ने कई साल बाद अपनी धारा 17-B के तहत अर्ज़ी दायर की थी।
धारा 17-B के अनुसार, अगर किसी मामले में लेबर कोर्ट/ट्रिब्यूनल/नेशनल ट्रिब्यूनल अपने फ़ैसले में किसी कर्मचारी को वापस काम पर रखने का निर्देश देता है और नियोक्ता (employer) हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती देता है तो नियोक्ता को हाईकोर्ट में कार्यवाही लंबित रहने के दौरान कर्मचारी को उसकी पिछली नौकरी के दौरान मिल रहा पूरा वेतन देना होगा। बशर्ते कि कर्मचारी उस अवधि के दौरान कहीं और नौकरी न कर रहा हो और उसने उस कोर्ट में इस बारे में हलफ़नामा दायर किया हो।
चीफ़ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी ने कहा,
"हमारी सोच यह है कि इस कानून के फ़ायदेमंद पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसका मकसद और इरादा यह पक्का करना है कि अवॉर्ड (फ़ैसले) को बिना देरी के लागू किया जाए। इसलिए एम्प्लॉयर को सबसे पहले जल्द से जल्द अपना कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए और गरीब कर्मचारी के नुकसान के लिए देरी करने वाले हथकंडों का फ़ायदा नहीं उठाना चाहिए। जिन कर्मचारियों ने नौकरी पर वापस लौटने के लिए राज्य के खिलाफ़ मुश्किल लड़ाई लड़ी और न्याय पाने में सफल रहे, उन्हें कानूनी लड़ाई का फ़ायदा मिलने से रोका नहीं जा सकता, खासकर तब जब राज्य ने याचिका दायर करने में चार साल की देरी की और बाद में 03.01.2022 को स्टे ऑर्डर (रोक का आदेश) ले लिया, जिसके कारण कर्मचारी को जल्दबाज़ी में अर्ज़ी दाखिल करनी पड़ी, जो 04.04.2022 को तैयार की गई और 20.05.2022 को दाखिल की गई...
एनेक्ज़र P-VIII को देखने से यह भी पता चलता है कि सरकार ने फाइलिंग की प्रक्रिया में बहुत समय लिया और अवॉर्ड को चुनौती देने की प्रक्रिया तभी शुरू की जब एग्जीक्यूशन की कार्यवाही शुरू हो गई। इसलिए सरकार रिट याचिका दाखिल करने में अपनी ही देरी का फ़ायदा उठाकर कर्मचारी का नुकसान या उसके साथ भेदभाव नहीं कर सकती।"
प्रतिवादी बीर सिंह, ने 1987 से अप्रैल 2010 में अपनी सेवाएँ खत्म होने तक कुल्लू के पार्वती फ़ॉरेस्ट डिवीज़न में डिवीज़नल फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर के साथ मौसमी वानिकी कार्यों में दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर रुक-रुक कर काम किया।
सुलह की कार्यवाही विफल होने के बाद विवाद को लेबर कोर्ट-कम-इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल, धर्मशाला के पास भेजा गया। ट्रिब्यूनल ने 21.11.2017 को अवॉर्ड पारित करते हुए उन्हें नौकरी पर वापस रखने का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने माना कि वे 2000 और 2010 के बीच लगातार बिना किसी रुकावट के सेवा में रहे थे, और उन्हें पिछले वेतन (बैक वेजेज़) को छोड़कर अन्य सभी संबंधित लाभ मिलने चाहिए।
राज्य ने इस अवॉर्ड को हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करके चुनौती दी, लेकिन अवॉर्ड के चार साल से ज़्यादा समय बाद 30.12.2021 को। इस बीच कर्मचारी ने अवॉर्ड के तीन महीने के भीतर 18.01.2018 को ही अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट जमा की थी। रिट याचिका स्वीकार होने और 03.01.2022 को अवार्ड (फैसले) के अमल पर रोक लगने के बाद कर्मचारी ने ID Act की धारा 17-B के तहत एक अर्ज़ी दायर की। इसमें कार्यवाही के दौरान उसे आखिरी बार मिली पूरी सैलरी देने की मांग की गई। इस अर्ज़ी के साथ 04.04.2022 को तैयार और 20.05.2022 को दायर किया गया एक हलफ़नामा भी था।
माननीय सिंगल जज ने 27.07.2023 को यह अर्ज़ी मंज़ूर की और अवार्ड की तारीख से ही पूरी सैलरी का भुगतान करने का आदेश दिया। राज्य ने इस आदेश को मौजूदा इंट्रा-कोर्ट अपील में चुनौती दी।
बेंच ने मुख्य सवाल इस तरह तय किया,
"मौजूदा अपील में सवाल यह है कि क्या एम्प्लॉयर (नियोक्ता) द्वारा रिट याचिका दायर करने में देरी के कारण, ID Act, 1947 की धारा 17-B के तहत सैलरी पाने के कर्मचारी के अधिकार को अवार्ड की तारीख से तय किया जाना चाहिए या ID Act, 1947 की धारा 17-B के तहत अर्ज़ी दायर करने की तारीख से, जिसके साथ ज़रूरी हलफ़नामा भी हो।"
राज्य ने तर्क दिया कि धारा 17-B के तहत आखिरी बार मिली सैलरी का भुगतान तभी ज़रूरी है जब कर्मचारी ने नौकरी न होने का ज़रूरी हलफ़नामा (Affidavit) जमा किया हो। चूंकि कर्मचारी का हलफ़नामा अप्रैल/मई 2022 में ही जमा किया गया, इसलिए 2017 के फ़ैसले (Award) से इसका फ़ायदा पिछली तारीख़ से लागू नहीं किया जा सकता। इसमें दिल्ली हाई कोर्ट के 'M/s कैपिटल मेंटेनेंस कॉर्पोरेशन बनाम NCT दिल्ली सरकार' (24.02.2022 को फ़ैसला) मामले का हवाला दिया गया, जिसमें धारा 17-B के तहत हलफ़नामे की ज़रूरत पर चर्चा की गई।
कर्मचारी के वकील ने तर्क दिया कि धारा 17-B एक फ़ायदेमंद कानून है, जिसका मकसद मुश्किलों को कम करना है। राज्य की अपनी देरी की वजह से (जिससे बीच का समय गुज़रा) कर्मचारी को सज़ा नहीं दी जा सकती।
बेंच ने धारा 17-B के पीछे के मकसद और कारणों (Statement of Objects and Reasons) का ज़िक्र किया, जिसे इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स (अमेंडमेंट) एक्ट के ज़रिए जोड़ा गया।
इसमें कहा गया:
"जब लेबर कोर्ट नौकरी पर वापस रखने (Reinstatement) का फ़ैसला सुनाते हैं तो अक्सर नियोक्ता (Employer) सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में इसे चुनौती देते हैं। ऐसा महसूस किया गया कि फ़ैसले को लागू करने में देरी से संबंधित कर्मचारी को परेशानी होती है। इसलिए यह प्रस्ताव रखा गया कि कुछ शर्तों के तहत फ़ैसले की तारीख़ से लेकर सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में मामले का अंतिम फ़ैसला होने तक, कर्मचारी को आखिरी बार मिली सैलरी का भुगतान किया जाए।"
कोर्ट ने कहा कि नौकरी न होने का हलफ़नामा जमा होते ही इस प्रावधान का फ़ायदा अनिवार्य रूप से मिलना शुरू हो जाता है। बस एक शर्त यह है कि अगर यह साबित हो जाए कि कर्मचारी उस दौरान कहीं और नौकरी कर रहा था, तो उस समय की सैलरी नहीं मिलेगी।
कोर्ट को कर्मचारी की कोई गलती नहीं मिली। कोर्ट ने देखा कि उसने फ़ैसले के तुरंत बाद अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट जमा कr थी और राज्य द्वारा स्टे (रोक) लेने के कुछ महीनों के भीतर ही धारा 17-B के तहत अपनी अर्ज़ी भी दी थी।
इसके विपरीत, बेंच ने राज्य की अपनी अंदरूनी फ़ाइल की जांच की। पाया गया कि राज्य के कानून विभाग ने फ़रवरी 2019 में ही यह राय दी थी कि फ़ैसला "आगे चुनौती देने लायक नहीं है" और इसे चुनौती देने के बजाय लागू करने की सलाह दी थी। विभाग की अपनी नोटिंग में कहा गया कि लेबर कोर्ट का फ़ैसला "सही, उचित और इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट की योजना के अनुरूप" लगता है। कोर्ट ने पाया कि रिट याचिका तब दायर की गई जब कर्मचारी ने आदेश को लागू करवाने की कार्यवाही शुरू की और उसके बाद वित्त विभाग ने दखल दिया।
यह मानते हुए कि राज्य सरकार धारा 17-B की तकनीकी व्याख्या का सहारा लेकर अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती, बेंच ने कहा:
"राज्य ने रिट याचिका दायर करने में चार साल की देरी की, जबकि याचिकाकर्ता ने 21.11.2017 को अपने पक्ष में आए फैसले के तीन महीने के अंदर ही, 18.01.2018 को अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट सौंप दी थी... राज्य इस ज़िम्मेदारी से बचने के लिए धारा की सख़्त व्याख्या का सहारा नहीं ले सकता, खासकर इसलिए क्योंकि वह रिट याचिका दायर करने में हुई देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बता पाया।"
सिंगल जज के आदेश में कोई कमी न पाते हुए डिवीज़न बेंच ने दखल देने से इनकार कर दिया और राज्य की अपील खारिज की।
Title: State of HP and another v. Bir Singh