पैतृक संपत्ति और जन्मसिद्ध अधिकार की अवधारणा मुस्लिम कानून में मान्य नहीं: गुजरात हाइकोर्ट ने महिला की हिस्सेदारी की मांग ठुकराई

Update: 2026-02-14 07:04 GMT

गुजरात हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संयुक्त परिवार संपत्ति पैतृक संपत्ति और जन्म से अधिकार जैसी अवधारणाएं जैसा कि हिंदू कानून में समझी जाती हैं, मुस्लिम कानून के अंतर्गत लागू नहीं होतीं। अदालत ने एक मुस्लिम महिला द्वारा अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग संबंधी याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया।

जस्टिस जे. सी. दोशी एक लंबे समय से लंबित पारिवारिक विवाद से जुड़े दीवानी पुनरीक्षण आवेदनों और अपीलों पर सुनवाई कर रहे थे। मामला वडोदरा स्थित कई अचल संपत्तियों को लेकर भाई-बहनों के बीच विवाद से संबंधित था।

अदालत ने कहा कि मुस्लिम कानून में नेमो एस्ट हेरेस विवेंटिस सिद्धांत मान्य है, जिसका अर्थ है कि जीवित व्यक्ति का कोई वारिस नहीं होता। किसी संभावित उत्तराधिकारी को संपत्ति पर ऐसा कोई प्रत्याशित अधिकार नहीं होता, जिसके आधार पर वह स्वामी द्वारा किए गए विक्रय या उपहार का विरोध कर सके। मुस्लिम कानून में उत्तराधिकार मृत्यु के बाद ही उत्पन्न होता है और प्रत्येक वारिस का हिस्सा अलग और निश्चित होता है।

हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैतृक संपत्ति की अवधारणा जन्मसिद्ध अधिकार से जुड़ी है, जो हिंदू सहभाजक व्यवस्था में मान्य है परंतु मुस्लिम कानून में ऐसी कोई मान्यता नहीं है। मुस्लिम परिवार में संयुक्त परिवार की धारणा भी लागू नहीं होती और न ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि परिवार के किसी सदस्य द्वारा अर्जित संपत्ति सभी के संयुक्त लाभ के लिए है।

अदालत ने कहा कि हिंदू कानून में संयुक्त परिवार या संयुक्त परिवार निधि के संबंध में जो पूर्वधारणा है, उसे मुस्लिम पक्षकारों के मामलों में पूरी तरह भुला देना चाहिए। मुस्लिम उत्तराधिकार व्यक्तिगत होता है और संपत्ति उत्तराधिकारियों को उनकी निश्चित हिस्सेदारी के अनुसार साझा स्वामित्व के रूप में प्राप्त होती है।

मामले की पृष्ठभूमि

मूल वादिनी मृतक माता-पिता की पुत्री हैं। उसने अपने भाइयों के नाम दर्ज कई संपत्तियों में हिस्सेदारी का दावा करते हुए वाद दायर किया। उनका कहना था कि ये संपत्तियां पिता की आय से परिवार के लाभ के लिए खरीदी गई थीं इसलिए इन्हें संयुक्त परिवार और पैतृक संपत्ति माना जाना चाहिए। उन्होंने संपत्तियों के हस्तांतरण और विकास पर रोक लगाने के लिए अंतरिम निषेधाज्ञा भी मांगी थी जिसे निचली अदालत ने आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था।

वादिनी का आरोप था कि भाइयों ने कुछ संपत्तियां बेच दीं और उन्हें हिस्सा नहीं दिया। बाद में जब शेष संपत्तियों के विकास की प्रक्रिया शुरू की गई तो उन्होंने अदालत का रुख किया।

प्रतिवादियों की ओर से सीनियर एडवोकेट मिहिर जोशी ने तर्क दिया कि वादिनी ने लगभग 37 वर्ष की देरी से वाद दायर किया जबकि उन्हें राजस्व अभिलेखों, पारिवारिक समझौते और विक्रय लेनदेन की पूरी जानकारी थी। इसलिए विलंब और मौन स्वीकृति के आधार पर उन्हें अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती।

वादिनी की ओर से सीनियर एडवोकेट पर्सी कवीना ने दलील दी कि संपत्तियां पिता की आय से परिवार के लाभ के लिए खरीदी गईं और पारिवारिक समझौते की सत्यता अभी सिद्ध नहीं हुई। यदि मुकदमे के दौरान संपत्ति का विक्रय हो गया तो उन्हें गंभीर क्षति होगी।

अदालत का निष्कर्ष

हाइकोर्ट ने कहा कि वाद और अंतरिम राहत का आधार संयुक्त परिवार संपत्ति और पैतृक संपत्ति की अवधारणा है, जो मुस्लिम कानून में मान्य नहीं है। इसलिए वाद की मूल नींव ही कानूनी रूप से अस्थिर है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि वादिनी साझेदारी अभिकर्ता संबंध या न्यासीय संबंध जैसे किसी विधिक आधार को पर्याप्त साक्ष्य के साथ स्थापित करतीं तो भारतीय न्यास अधिनियम या अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत दावा संभव हो सकता था। लेकिन प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम निषेधाज्ञा आदेश को रद्द कर दिया और अपील स्वीकार की।

Tags:    

Similar News