आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे आरोपी को विदेश यात्रा का अधिकार है या नहीं, यह तय करने का अधिकार पासपोर्ट प्राधिकरण को नहीं : गुजरात हाइकोर्ट
गुजरात हाइकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले का सामना कर रहे आरोपी को विदेश यात्रा का अधिकार है या नहीं, यह तय करने का अधिकार पासपोर्ट प्राधिकरण के पास नहीं है। अदालत ने कहा कि यह अधिकार केवल संबंधित ट्रायल कोर्ट के पास है, जो विदेश जाने की अनुमति मांगने पर आवश्यक शर्तें लगा सकता है।
जस्टिस अनिरुद्ध पी. मयी की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की जिसमें याचिकाकर्ता ने विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट जारी किए जाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 504 (जानबूझकर अपमान), 506 (आपराधिक धमकी) और 114 (अपराध के समय सहयोगी की उपस्थिति) के तहत FIR दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि FIR दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी ने बी-समरी रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसमें कहा गया कि कोई अपराध बनता नहीं है। इस रिपोर्ट को मजिस्ट्रेट अदालत ने स्वीकार कर लिया था। हालांकि बाद में सेशन कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया गया। इसके पश्चात सह-आरोपी ने हाइकोर्ट का रुख किया, जहां मामला अभी लंबित है।
क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी की ओर से यह तर्क दिया गया कि जिन नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही लंबित है, उन्हें विदेश यात्रा के लिए संबंधित अदालत से अनुमति आदेश प्रस्तुत करना आवश्यक है।
इस पर जस्टिस अनिरुद्ध पी. मयी ने कहा कि पासपोर्ट प्राधिकरण को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि आरोपी को विदेश जाने का अधिकार है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा अधिकार केवल ट्रायल कोर्ट के पास है, जो आवेदन आने पर उचित शर्तें लगा सकता है।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि बॉम्बे हाइकोर्ट द्वारा पूर्व में जारी निर्देश पासपोर्ट प्राधिकरण पर बाध्यकारी हैं, जिनके अनुसार कानून और नियमों के तहत 10 वर्षों की अवधि के लिए पासपोर्ट जारी किया जाना चाहिए।
अदालत ने प्रतिवादी प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता का पासपोर्ट 10 वर्षों की अवधि के लिए जारी किया जाए और पासपोर्ट जारी करने के लिए आवेदन किए जाने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर उस पर निर्णय लिया जाए।
हालांकि, हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को विदेश यात्रा करने से पहले संबंधित सक्षम अदालत से अनुमति लेनी होगी, जो आवश्यक शर्तें लगा सकती है।
इन निर्देशों के साथ गुजरात हाइकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर मामले का निस्तारण कर दिया।