बाद में अनुसूचित जातियों की सूची से जाति को हटाने पर पहले मिला प्रमोशन वापस नहीं लिया जा सकता: गुजरात हाईकोर्ट

Update: 2026-07-25 19:06 GMT

गुजरात हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति को मिला जाति आरक्षण का लाभ संबंधित जाति को अनुसूचित जातियों की सूची से हटाए जाने पर बीच में रोका नहीं जा सकता।

ऐसा करते हुए कोर्ट ने अधिकारी के डिमोशन (पद घटाने) का आदेश रद्द किया। उस अधिकारी को पहले उसकी जाति के आधार पर प्रमोशन मिला, लेकिन बाद में उसकी जाति को अनुसूचित जातियों की सूची से हटाए जाने के कारण उसका पद घटा दिया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन वापस लेना और याचिकाकर्ता का पद घटाना सही नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस एनएस संजय गौडा और जस्टिस जेएल ओदेदरा की डिवीज़न बेंच ने कहा:

"एक व्यक्ति को जन्म के समय ही जाति मिल जाती है और यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता। जन्म के समय मिली जाति जीवन भर उसके साथ रहती है। इस तरह जाति एक ऐसी पहचान है, जो जन्म से ही व्यक्ति के साथ जुड़ जाती है और जीवन भर बनी रहती है। यदि कोई व्यक्ति ऐसी जाति में पैदा होता है, जिसे उसके जन्म के समय अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया तो इसका मतलब यह होगा कि उस समय उसकी जाति को सामाजिक रूप से पिछड़ा माना गया और उसे लाभों की आवश्यकता थी। इसका यह भी अर्थ होगा कि वह व्यक्ति जीवन भर सामाजिक रूप से पिछड़ा बना रहेगा, भले ही उसकी जाति समग्र रूप से भविष्य में सामाजिक रूप से उन्नत हो जाए, जिसके परिणामस्वरूप संसद पूरी जाति को आरक्षण के लाभों से बाहर करने का निर्णय ले सकती है।

यह उस व्यक्ति पर भी लागू होगा, जो अपनी जाति के अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित होने से पहले पैदा हुआ, लेकिन आरक्षण का लाभ उठाता है, क्योंकि उसके जन्म के बाद उसकी जाति को अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया और परिणामस्वरूप उसने आरक्षण का लाभ उठाया। अनुसूचित जातियों की सूची से किसी जाति को बाहर करना केवल भविष्य-प्रभावी (prospective) हो सकता है और जिस व्यक्ति का जन्म उस जाति में हुआ, जब उसे अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किया गया, उसे मिले लाभ उसके जीवनकाल में बने रहेंगे। ऐसा मूल रूप से इसलिए है, क्योंकि जाति जन्म से प्राप्त होती है और व्यक्ति की मृत्यु पर ही समाप्त होती है।"

अदालत ने कहा कि इसके विपरीत विचार - कि किसी व्यक्ति की जाति को अनुसूचित जाति की श्रेणी से बाहर किए जाने पर उसे शुरू में मिले आरक्षण के सभी लाभ समाप्त हो जाएंगे - का अर्थ यह होगा कि कानून किसी व्यक्ति को बीच में ही छोड़ देना चाहता है और एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य का वादा करने के बाद उससे खुद अपना रास्ता बनाने की अपेक्षा करता है।

अदालत ने कहा कि ऐसी व्याख्या का अर्थ यह होगा कि जिस व्यक्ति को संवैधानिक अधिकार दिया गया, वह संसदीय कानून के कारण उस संवैधानिक अधिकार को खो देगा और मझधार में छूट जाएगा; संसदीय कानून की ऐसी व्याख्या संवैधानिक रूप से अनैतिक होगी।

अदालत ने आगे कहा,

"हमारी राय में संसदीय कानून के ज़रिए किसी जाति को अनुसूचित जाति की सूची से हटाने के बुरे असर को कम करने के लिए यह मानना ​​सही होगा कि जो व्यक्ति अनुसूचित जाति में पैदा हुआ (जब उसे अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित किया गया) या जिस व्यक्ति ने आरक्षण का लाभ उठाया, क्योंकि उस समय उसकी जाति को अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित किया गया, वह अपनी पूरी ज़िंदगी आरक्षण के सभी लाभों का हकदार होगा और बीच में उसे यह लाभ नहीं खोना पड़ेगा।

नतीजतन, कोई भी व्यक्ति जो ऐसी जाति में पैदा हुआ है, जिसे उसके जन्म के समय अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित नहीं किया गया (भले ही उसकी जाति को पहले अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित किया गया हो), वह आरक्षण के किसी भी लाभ का हकदार नहीं होगा।"

प्रतिवादी को 1995 में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) में लोअर डिवीज़न क्लर्क (LDC) के तौर पर अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत नियुक्त किया गया, क्योंकि वह मोची जाति से था, जिसे उस समय 'संविधान (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976' के तहत राज्य में अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित किया गया।

इसके बाद 2002 में संसद द्वारा 'संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश (दूसरा संशोधन) अधिनियम' लागू किया गया, जिसके ज़रिए मोची जाति के लोगों के लिए क्षेत्र संबंधी प्रतिबंध लागू किए गए।

इसके तहत सिर्फ़ डांग ज़िले और वलसाड ज़िले के उंबरगांव तालुका के मोची समुदाय के लोगों को ही SC (अनुसूचित जाति) माना गया; जबकि इससे पहले गुजरात के सभी मोची SC श्रेणी में आते थे।

2003 में संबंधित व्यक्ति को एनफोर्समेंट ऑफ़िसर/अकाउंट्स ऑफ़िसर के पद पर प्रमोट किया गया और यह प्रमोशन इस आधार पर मिला कि वह आरक्षित श्रेणी से थे।

प्रमोशन के नौ साल बाद 29.11.2012 से उन्हें वापस अपर डिवीज़न क्लर्क के पद पर भेज दिया गया। यह डिमोशन (पद घटाने) इस आधार पर किया गया कि 2002 के संशोधन के कारण उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

उन्होंने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का दरवाज़ा खटखटाया, जिसने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया। इसके ख़िलाफ़ EPFO ​​हाईकोर्ट गया।

CAT का आदेश सही ठहराते हुए बेंच ने कहा कि चूंकि संबंधित व्यक्ति का जन्म मोची जाति में हुआ था, जिसे अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित किया गया और उन्होंने तब आरक्षण का लाभ लिया था, जब उनकी जाति SC श्रेणी में थी, इसलिए वह जीवन भर आरक्षण के सभी लाभों के हकदार होंगे। बेंच ने आगे कहा कि नतीजतन, 2012 में डिमोशन का आदेश देकर 2003 में मिले प्रमोशन को वापस लेने का फ़ैसला सही नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने EPFO ​​की अपील खारिज की।

Case title: EMPLOYEES' PROVIDENT FUND ORGANIZATION & ORS. v/s RANJIT VASANTLAL MAKWANA

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