गुजरात हाईकोर्ट ने पति की सजा बरकरार रखी, पत्नी की हत्या को आत्महत्या दिखाने की साजिश साबित

Update: 2026-03-27 08:05 GMT

गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा पति को दी गई सजा को बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने अपनी पत्नी की गला घोंटकर हत्या की और बाद में घटना को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की।

यह मामला 20 सितंबर 2014 का है, जब पति-पत्नी के बीच घरेलू विवाद के दौरान आरोपी ने कथित तौर पर सूती दोरी/रस्सी से पत्नी का गला घोंट दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने खुद को बचाने और पुलिस को गुमराह करने के लिए घटना स्थल को इस तरह तैयार किया कि वह फांसी लगाकर आत्महत्या जैसा लगे, और तत्पश्चात पुलिस स्टेशन जाकर झूठी सूचना दी कि उसकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली है।

बाद में मृतका के पिता, जो सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी हैं, ने इस पर आपत्ति जताते हुए शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला है।

मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानीशामिल थे, ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने मेडिकल, फॉरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर यह साबित कर दिया है कि मृत्यु गला घोंटने के कारण हुई थी और आत्महत्या का दावा बाद में गढ़ा गया था।

कोर्ट ने फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट को निर्णायक माना, जिसमें रस्सी में मृतका के बाल पाए गए और घटनास्थल की परिस्थितियां फांसी के अनुकूल नहीं थीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर क्षैतिज निशान, थायरॉयड कार्टिलेज में फ्रैक्चर, और अन्य ऐसे संकेत मिले जो गला घोंटकर हत्या की ओर इशारा करते हैं। इसके अलावा, कमरे की स्थिति, बिखरे हुए सामान और ऊंचाई के अनुपात ने भी आत्महत्या की संभावना को खारिज किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी का व्यवहार—जैसे तुरंत झूठी रिपोर्ट दर्ज कराना और अस्पताल में टालमटोल करना—उसके अपराध को छुपाने की मंशा को दर्शाता है।

कानूनी पहलू पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पर यह प्रारंभिक दायित्व होता है कि वह आरोपों को संदेह से परे साबित करे, जिसे इस मामले में सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इसके बाद Section 106 Indian Evidence Act के तहत आरोपी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह उन तथ्यों का स्पष्टीकरण दे जो उसके विशेष ज्ञान में हों, लेकिन आरोपी ऐसा करने में विफल रहा।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने सही ठहराया। वहीं, धारा 182 IPC के तहत उसे बरी करने के फैसले को राज्य ने चुनौती नहीं दी थी।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन ने घटनाक्रम की पूरी कड़ी को ठोस साक्ष्यों से स्थापित कर दिया है और आरोपी का आत्महत्या का दावा पूरी तरह असत्य है।

Tags:    

Similar News