18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से सिर्फ दोस्ताना रिश्ते भी कानूनन मंज़ूर नहीं, इसी वजह से कई युवा जेलों में सड़ रहे हैं: गुजरात हाईकोर्ट

Update: 2026-01-30 11:31 GMT

गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में एक नाबालिग लड़की के कथित अपहरण के मामले में दो युवकों की सजा को रद्द करते हुए कहा कि वे 'गुड समैरिटन' (Good Samaritans) थे, जिन्होंने संकट में फंसी लड़की की मदद की, लेकिन इसके बदले उन्हें जेल जाना पड़ा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ किसी भी प्रकार के संबंध—even यदि वह मित्रतापूर्ण हों—को कानून की मंजूरी न होने के कारण कई युवा सख्त कानूनों के तहत जेलों में सड़ रहे हैं।

जस्टिस गीता गोपी ने यह टिप्पणी दो युवकों—रोहन और अमित—द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए की। ट्रायल कोर्ट ने दोनों को धारा 363 आईपीसी (अपहरण) और धारा 366 आईपीसी (विवाह के लिए अपहरण/प्रलोभन) के तहत दोषी ठहराते हुए प्रत्येक अपराध के लिए दो वर्ष की सजा दी थी। इसके साथ ही उन्हें अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत भी दोषी ठहराया गया था।

अभियोजन का आरोप

अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने शिकायतकर्ता की बेटी को विवाह का झूठा आश्वासन देकर बहला-फुसलाकर उसके पिता की वैधानिक अभिरक्षा से बाहर ले जाकर अपहरण किया।

बचाव पक्ष की दलील

आरोपियों का कहना था कि कथित पीड़िता बालिग थी और उसने स्वेच्छा से घर छोड़ा था। न तो उसे बहकाया गया और न ही अपहरण किया गया। साक्ष्यों के अनुसार, लड़की को उसके भाई ने मारा था, जिसके बाद वह नर्मदा नहर में आत्महत्या करने गई थी, जहां उसे पुलिस ने पाया। पुलिस इस बात से भी अवगत थी कि वह एक गेस्ट हाउस में रह रही थी। लड़की ने गांधीनगर से अहमदाबाद और अन्य स्थानों तक अपनी इच्छा से आरोपियों के साथ यात्रा की। उसे कई अवसर मिले, जब वह पुलिस से शिकायत कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस गीता गोपी ने कहा—

“गवाहों की गवाही से यह स्पष्ट है कि संकट की घड़ी में पुलिस लड़की की रक्षा करने में विफल रही। जब लड़की आत्महत्या करने नर्मदा नहर गई थी, तब उसे उसके माता-पिता को सौंपा जाना चाहिए था। दोनों आरोपी 'गुड समैरिटन' की भूमिका में थे, लेकिन जेल पहुंच गए।”

अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही से यह सिद्ध नहीं होता कि आरोपियों ने उसे जबरन या छलपूर्वक उसके माता-पिता की अभिरक्षा से निकाला। उसे कई मौके मिले, यहां तक कि जब वह एक ऑटो रिक्शा में थी और पुलिस ने उसे रोका था, तब भी उसने स्वयं को आरोपी रोहन की बहन बताकर परीक्षा केंद्र जा रही बताया।

अदालत ने कहा कि आरोपी अमित की भूमिका केवल मदद करने वाले व्यक्ति की थी, जिसने पैसे दिए और कपड़े खरीदे। दोनों आरोपियों को यह अंदेशा नहीं था कि लड़की की रक्षा करना उन्हें जेल पहुंचा देगा।

सख्त कानूनों पर चिंता

कोर्ट ने आगे कहा—

“देर से किशोरावस्था और युवा वयस्कों को यह सीख मिल रही है कि संकट में फंसी 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की मदद करना भी उन्हें आईपीसी या पॉक्सो जैसे सख्त कानूनों के तहत मुकदमे और जेल तक ले जा सकता है। कई युवा इन्हीं कारणों से जेलों में पड़े हैं।”

माता-पिता और पुलिस की भूमिका पर सवाल

अदालत ने यह भी कहा कि युवा लड़कियां अक्सर अपनी राय व्यक्त करने और निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं होतीं। संभव है कि लड़की अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेना चाहती हो, लेकिन माता-पिता ने उसे ऐसा करने नहीं दिया।

कोर्ट ने माना कि लड़की ने पुलिस को बताया होगा कि उसने स्वेच्छा से घर छोड़ा था और आत्महत्या करना चाहती थी, लेकिन संभवतः माता-पिता ने उसे विपरीत बयान देने के लिए मजबूर किया, जिससे आरोपियों के खिलाफ मामला बना।

अदालत ने कहा कि लड़की को यह भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उसकी ट्यूटर्ड गवाही आरोपियों को गिरफ्तारी, लंबी विचाराधीन कैद और सामाजिक कलंक की ओर ले जाएगी।

अपराध सिद्ध नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला धारा 363, 366 आईपीसी और अत्याचार अधिनियम की धारा 3(1)(xi) के तहत था, जहां कोई वैधानिक आपराधिक अनुमान (statutory presumption) लागू नहीं होता। अभियोजन संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में विफल रहा।

अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि घटना के समय लड़की 18 वर्ष से कम थी। इसलिए संदेह का लाभ आरोपियों को मिला।

कोर्ट ने कहा—

“न तो अपहरण के आवश्यक तत्व सिद्ध हुए और न ही किसी प्रकार के शोषण या जबरदस्ती का प्रमाण है। लड़की लगभग 13 दिन आरोपियों के साथ रही, लेकिन साक्ष्यों के अनुसार उसके साथ कोई यौन उत्पीड़न नहीं हुआ।”

पीड़िता ने जिरह में कहा कि आरोपियों ने उसके साथ कभी कोई क्रूरता, जबरदस्ती या अवैध कृत्य नहीं किया। दिन या रात में वे केवल बातचीत करते थे—एक दोस्त की तरह।

निष्कर्ष

अदालत ने कहा कि लड़की के घर छोड़ने का कारण आत्महत्या का इरादा था, न कि अपहरण। पुलिस को यह जानकारी होने के बावजूद उसे माता-पिता की अभिरक्षा में नहीं सौंपा गया। पूरे मामले में दोष पुलिस और पारिवारिक परिस्थितियों की विफलता का था, लेकिन आरोप युवकों पर डाल दिए गए।

इन निष्कर्षों के साथ गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Tags:    

Similar News