कामकाजी मां का बच्ची को अपने माता-पिता के पास छोड़ना अवैध नहीं, हैबियस कॉर्पस से कस्टडी विवाद नहीं सुलझाया जा सकता: गुजरात हाइकोर्ट

Update: 2026-02-12 07:13 GMT

गुजरात हाइकोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसले में कहा कि किसी कामकाजी मां द्वारा अपनी नाबालिग बेटी की देखभाल के लिए उसे अपने माता-पिता के पास छोड़ना न तो अवैध कस्टडी है और न ही इसे हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक बच्चे की कस्टडी को लेकर कोई आदेश या कार्यवाही लंबित नहीं है, तब तक ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस का सहारा नहीं लिया जा सकता।

जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी.एम. व्यास की खंडपीठ पिता द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पिता ने आरोप लगाया कि उसकी चार साल की बेटी को मां और ननिहाल पक्ष ने अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है और बच्ची की कस्टडी उसे सौंपी जाए।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा,

“सबसे पहले यह कहना जरूरी है कि एक चार साल की नाबालिग बच्ची का अपनी मां के पास होना किसी भी स्थिति में न तो अवैध कस्टडी कहा जा सकता है और न ही गैरकानूनी कैद। जब माता-पिता के बीच कस्टडी को लेकर कोई मामला लंबित नहीं है और कोई आदेश मौजूद नहीं है, तब ऐसी हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि इतनी छोटी उम्र की बच्ची की जरूरतों को समझते हुए उसकी देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी मां पर ही होती है, न कि पिता पर।

कोर्ट ने कहा,

“चार साल की बच्ची की परवरिश और भावनात्मक जरूरतों को देखते हुए यह जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से मां के कंधों पर होती है।”

खंडपीठ ने कामकाजी दंपतियों की व्यावहारिक परेशानियों को भी स्वीकार करते हुए कहा,

“आज के समय में जब दोनों माता-पिता कामकाजी हों तो बिना पारिवारिक सहयोग के बच्चे की परवरिश करना बेहद कठिन हो जाता है। यदि ऐसी स्थिति में कोई कामकाजी महिला अपने माता-पिता की मदद लेने का फैसला करती है ताकि बच्चा सुरक्षित और बेहतर माहौल में पल सके तो पति यह नहीं कह सकता कि यह अवैध कस्टडी या गैरकानूनी हिरासत है।”

यह मामला पति-पत्नी के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। दोनों सरकारी कर्मचारी हैं और स्थानांतरण के कारण अलग-अलग जगहों पर तैनात रहे। बाद में वे कच्छ जिले में साथ रहने लगे लेकिन मतभेद बढ़ने पर अलग हो गए। पिता का आरोप था कि अगस्त, 2023 में मां बच्ची को अपने मायके ले गई और उसकी इच्छा के खिलाफ वहीं छोड़ दिया। उसने यह भी कहा कि बच्ची की स्कूलिंग की व्यवस्था उसने की थी और फीस भी उसने ही भरी थी।

वहीं मां का कहना था कि दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्ची की देखभाल मुश्किल हो रही थी, इसलिए उसने अपने माता-पिता से मदद मांगी।

कोर्ट ने इस पूरे विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा,

“यह केवल एक मां द्वारा अपनी बेटी की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने के लिए किया गया पारिवारिक इंतजाम है। केवल इस आधार पर कि पिता इससे सहमत नहीं है इसे अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की भलाई और कस्टडी से जुड़े सवालों का फैसला हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए नहीं किया जा सकता।

“हैबियस कॉर्पस कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिसके जरिए वैवाहिक विवादों में बच्चे की कस्टडी या कल्याण से जुड़े मुद्दों का निपटारा किया जाए। यदि पिता को अंतरिम या स्थायी कस्टडी चाहिए तो उसे फैमिली कोर्ट के समक्ष उचित साक्ष्यों के साथ याचिका दायर करनी होगी।”

इन टिप्पणियों के साथ गुजरात हाइकोर्ट ने पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की।

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