सिर्फ संदेह सजा का आधार नहीं हो सकता, अपराध सिद्ध करने में राज्य विफल: गुजरात हाइकोर्ट ने गैंगरेप-हत्या मामले में तीनों की मौत की सजा रद्द की

Update: 2026-01-16 06:46 GMT

गुजरात हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में गैंगरेप और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए तीन आरोपियों की मौत की सजा को रद्द कर दिया।

हाइकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में असफल रही और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं हो सकी। ऐसे में केवल आशंका के आधार पर सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वछानी की खंडपीठ आरोपियों की अपील और मौत की सजा की पुष्टि के लिए भेजे गए संदर्भ पर सुनवाई कर रही थी।

अदालत ने माना कि मृतका के साथ बलात्कार और उसकी निर्मम हत्या की गई थी और अपराध अत्यंत गंभीर है, लेकिन इसके बावजूद आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक दोष सिद्ध न हो, आरोपी को निर्दोष माना जाता है।

हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चाहे संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।

अभियोजन को यह साबित करना होता है कि आरोपी ने ही अपराध किया है, न कि केवल यह कि उसने किया हो सकता है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 'निठारी कांड' से जुड़े सुरेंद्र कोली मामले का भी हवाला देते हुए कहा कि भयानक अपराधों में भी कानून अनुमान या कयास के आधार पर दोषसिद्धि की अनुमति नहीं देता।

अदालत ने पाया कि अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पूर्ण और निर्बाध श्रृंखला प्रस्तुत नहीं कर सका, जो केवल आरोपियों के दोष की ओर ही इशारा करती हो। DNA साक्ष्य को लेकर भी हाइकोर्ट ने गंभीर खामियां पाईं।

कोर्ट ने कहा कि DNA सैंपल समय पर FSL अहमदाबाद नहीं भेजे गए और करीब 14 दिनों तक सैंपल की कस्टडी, भंडारण और परिवहन को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। ऐसे में DNA रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

'लास्ट सीन थ्योरी' के संबंध में भी हाइकोर्ट ने अभियोजन के गवाह पर संदेह जताया। कोर्ट ने कहा कि जिस दुकानदार ने मृतका को कथित रूप से आरोपियों के साथ आखिरी बार देखने का दावा किया, उसकी गवाही भरोसेमंद नहीं है। न तो उसकी पहचान परेड कराई गई और न ही उसकी गवाही की किसी अन्य साक्ष्य से पुष्टि हो सकी। ऐसे में केवल उसके बयान के आधार पर आरोपियों को अपराध से जोड़ना सुरक्षित नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों के कथित मेडिकल इतिहास को अपराध से जोड़ने का प्रयास भी कानूनन स्वीकार्य नहीं है और उससे कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए गुजरात हाइकोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है।

परिणामस्वरूप, तीनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी करते हुए उनकी दोषसिद्धि और मौत की सजा रद्द कर दी गई।

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