बलात्कार में मदद करने पर महिला को 10 साल की जेल, दिल्ली हाईकोर्ट ने लगातार आपराधिक आचरण का दिया हवाला

Update: 2026-03-28 04:08 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला को बलात्कार करने में मदद करने के लिए 10 साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। कोर्ट ने सज़ा में नरमी न बरतने के मुख्य कारण के तौर पर महिला की आपराधिक गतिविधियों में लगातार संलिप्तता पर ज़ोर दिया।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने राज्य सरकार द्वारा दायर अपील पर सज़ा का यह आदेश पारित किया। इस अपील में महिला को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दोषी महिला ने इस अपराध में "सक्रिय और जान-बूझकर भूमिका" निभाई थी।

कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि महिला ने पीड़िता को बहलाया-फुसलाया, बलात्कार की घटना के दौरान वह मौके पर मौजूद रही, और बाद में उसने पीड़िता को धमकाया भी।

सज़ा पर सुनवाई के दौरान, दोषी महिला ने कोर्ट से नरमी बरतने की गुहार लगाई। उसने इसके पीछे यह तर्क दिया कि उसे लंबे समय तक चले मुक़दमे का सामना करना पड़ा है, वह लगभग नौ महीने तक हिरासत में रही है। उसका एक पांच साल का बच्चा है, जिसकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं है।

हालांकि, कोर्ट ने सज़ा कम करने से इनकार कर दिया और यह टिप्पणी की:

"मौजूदा अपराध को अंजाम देने के बाद भी प्रतिवादी/दोषी महिला के आचरण में सुधार का कोई संकेत नहीं दिखा। इसके विपरीत, जैसा कि रिकॉर्ड में दर्ज है, वह बाद में कई अन्य आपराधिक मामलों में भी शामिल रही है - जिनमें IPC की धारा 302 के तहत दर्ज मामले भी शामिल हैं - और वर्तमान में वह न्यायिक हिरासत में है। यह उसके आपराधिक व्यवहार के लगातार जारी रहने वाले पैटर्न को दर्शाता है, न कि किसी एक-अकेली घटना को। दोषी महिला का बाद में भी गंभीर अपराधों में शामिल होना यह साबित करता है कि प्रतिवादी/दोषी महिला ने आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होना बंद नहीं किया।"

कोर्ट ने आगे यह भी दोहराया कि जहां कोई कानून (Statute) किसी अपराध के लिए न्यूनतम सज़ा निर्धारित करता है, वहां अदालतें उस न्यूनतम सज़ा से कम सज़ा नहीं सुना सकतीं। फिर चाहे मुक़दमे का लंबा चलना या व्यक्तिगत परिस्थितियां जैसी कोई भी नरमी बरतने लायक वजहें क्यों न मौजूद हों।

तदनुसार, कोर्ट ने दोषी महिला को IPC की धारा 376 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 109 के तहत 10 साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। साथ ही उस पर ₹70,000 का जुर्माना भी लगाया।

कोर्ट ने पीड़िता द्वारा सहे गए "मानसिक आघात" (Trauma) को भी संज्ञान में लिया। पीड़िता ने एक दशक से भी अधिक समय तक न्याय के लिए संघर्ष किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि में से ₹50,000 पीड़िता को मुआवज़े के तौर पर दिए जाएं।

Case title: State v. Sweety

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