विज्ञापन में प्रावधान हो तो परीक्षा से पहले न्यूनतम अंक तय कर सकता है भर्ती प्राधिकरण : दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि भर्ती विज्ञापन में इसका स्पष्ट प्रावधान हो तो भर्ती प्राधिकरण चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी संबंधित परीक्षा चरण से पहले न्यूनतम अर्हक अंक निर्धारित कर सकता है।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने यह निर्णय याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता संयुक्त प्रशासनिक सेवा परीक्षा-2023 के तहत अनुभाग अधिकारी पद के अभ्यर्थी थे। यह परीक्षा वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद द्वारा आयोजित की गई। दिसंबर, 2023 में 444 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया। विज्ञापन में स्पष्ट उल्लेख था कि न्यूनतम अर्हक अंक सक्षम प्राधिकारी द्वारा तय किए जाएंगे।
परीक्षा दो चरणों में आयोजित हुई पहला चरण (प्रश्नपत्र-1 और प्रश्नपत्र-2) तथा दूसरा चरण (प्रश्नपत्र-3)। पहले चरण के परिणाम घोषित होने के बाद परिषद ने एक सूचना जारी कर प्रश्नपत्र-3 के लिए न्यूनतम अर्हक अंक निर्धारित कर दिए। याचिकाकर्ता परीक्षा में शामिल हुए किंतु प्रश्नपत्र-3 में निर्धारित न्यूनतम अंक प्राप्त न करने के कारण साक्षात्कार के लिए चयनित नहीं हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में याचिका दायर कर न्यूनतम अंक निर्धारित करने के निर्णय को चुनौती दी। अधिकरण ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि विज्ञापन में यह विवेकाधिकार स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखा गया और संबंधित परीक्षा चरण से पहले ही अंक अधिसूचित कर दिए गए थे। साथ ही, बिना आपत्ति प्रक्रिया में भाग लेने के बाद अभ्यर्थी बाद में इसे चुनौती नहीं दे सकते।
अधिकरण के आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाइकोर्ट का रुख किया।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद प्रश्नपत्र-3 के लिए न्यूनतम अंक तय करना मनमाना है और चयन मानदंडों में बीच में बदलाव के समान है। इस संबंध में उन्होंने तेज प्रकाश पाठक एवं अन्य बनाम राजस्थान हाइकोर्ट एवं अन्य तथा सलाम समरजीत सिंह बनाम मणिपुर हाइकोर्ट, इम्फाल एवं अन्य के फैसलों का हवाला दिया।
वहीं परिषद की ओर से कहा गया कि भर्ती विज्ञापन में स्पष्ट था कि न्यूनतम अर्हक अंक सक्षम प्राधिकारी तय करेगा। प्रश्नपत्र-3 के लिए न्यूनतम अंक उसी परीक्षा से पहले घोषित कर दिए गए थे, इसलिए किसी प्रकार का आश्चर्य या पक्षपात नहीं हुआ।
हाइकोर्ट का निर्णय
खंडपीठ ने कहा कि भर्ती विज्ञापन की धारा 5-ए में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि न्यूनतम अर्हक अंक सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित किए जाएंगे। जब ऐसा विवेकाधिकार विज्ञापन में सुरक्षित है तो यह नहीं कहा जा सकता कि बीच प्रक्रिया में नियम बदले गए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने तेज प्रकाश पाठक एवं अन्य बनाम राजस्थान हाइकोर्ट एवं अन्य मामले में कहा था कि वैधानिक नियमों के अभाव में भर्ती प्राधिकरण उपयुक्त चयन पद्धति विकसित कर सकता है, जिसमें न्यूनतम मानक तय करना भी शामिल है, बशर्ते यह संबंधित परीक्षा चरण से पहले अधिसूचित हो और अभ्यर्थियों को अचानक प्रभावित न करे। मूल्यांकन के बाद मानदंड बदलना अवैध है, किंतु परीक्षा से पहले अर्हक अंक तय करना वैध है।
अदालत ने पाया कि प्रश्नपत्र-3 के लिए न्यूनतम अंक दूसरे चरण की परीक्षा से पहले घोषित किए गए थे। यह भी स्पष्ट किया गया कि मूल्यांकन प्रक्रिया या परिणाम का इस मानक निर्धारण पर कोई प्रभाव नहीं था।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता किसी प्रकार की वास्तविक क्षति सिद्ध नहीं कर सके। न्यूनतम अंक निर्धारित करना अगले चरण के लिए अभ्यर्थियों को छांटने की प्रक्रिया थी और यह सभी पर समान रूप से लागू हुआ।
साथ ही, बिना किसी आपत्ति के परीक्षा में शामिल होने के बाद असफल रहने पर प्रक्रिया को चुनौती देना स्वीकार्य नहीं है। परिषद ने पदों की कार्यात्मक आवश्यकताओं के आधार पर न्यूनतम अंक निर्धारित करने को उचित ठहराया था।
इन टिप्पणियों के साथ दिल्ली हाइकोर्ट ने अधिकरण के आदेश को बरकरार रखा और अभ्यर्थियों की रिट याचिकाएं खारिज कर दीं।