न्यायपालिका के खिलाफ लगातार अपमानजनक अभियान पर चुप्पी जनता का भरोसा कमजोर कर सकती है: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-05-15 06:56 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करते हुए कहा कि न्यायपालिका के खिलाफ लगातार चलाए जाने वाले अपमानजनक अभियानों के सामने अदालत की चुप्पी को आत्मसमर्पण नहीं माना जा सकता।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 68 पन्नों के विस्तृत फैसले में कहा कि अदालत के सामने दो विकल्प थे या तो चुप रहना या अपने संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन करना। अदालत ने दूसरा रास्ता चुना, क्योंकि न्यायालय और न्यायपालिका की संस्था के खिलाफ सुनियोजित बदनाम करने का अभियान चलाया गया।

हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक और विनय मिश्रा के खिलाफ कथित सोशल मीडिया अभियान को लेकर अवमानना कार्यवाही शुरू की।

यह मामला आबकारी नीति से जुड़े प्रकरण की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वरण कांता शर्मा को निशाना बनाकर सोशल मीडिया पर किए गए कथित पोस्ट और टिप्पणियों से संबंधित है।

अदालत ने कहा कि एक जज से अपेक्षा की जाती है कि वह शांत रहे और जनमत से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार फैसला दे। हालांकि, जब कोई पक्ष निष्पक्ष आलोचना की सीमा पार कर सुनियोजित तरीके से जज को बदनाम करने लगे, तब मामला केवल आलोचना तक सीमित नहीं रह जाता।

अदालत ने टिप्पणी की,

“यह उम्मीद करना बहुत ज्यादा होगा कि कोई जज इतना असंवेदनशील हो कि लगातार सार्वजनिक अपमान, बदनामी और अदालत की गरिमा गिराने के प्रयासों से बिल्कुल प्रभावित न हो। जज भी इंसान हैं, देवता नहीं।”

हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में जजों और अदालतों के खिलाफ कथित अभियान चलाना और कुछ ही समय में सार्वजनिक धारणा तैयार करना बेहद आसान हो गया है। अदालत ने कहा कि “न्याय के स्रोत को दूषित करना” अब पहले से अधिक आसान हो चुका है।

अदालत ने यह भी कहा कि प्रभावशाली व्यक्ति या राजनीतिक नेता यदि चाहें तो सार्वजनिक रूप से जजों को बदनाम कर सकते हैं, लेकिन न्यायिक अनुशासन के कारण जज मीडिया मंचों पर जाकर अपना बचाव नहीं कर सकते।

फैसले में कहा गया कि यदि किसी जज के आदेश से कोई पक्ष असंतुष्ट है तो कानून अपील और उच्च अदालत में चुनौती का रास्ता देता है। हालांकि, कानून सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के जरिए झूठे अभियान चलाकर जजों के चरित्र हनन की अनुमति नहीं देता।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अदालत ने कहा कि संगठित सोशल मीडिया अभियानों के जरिए अदालत के खिलाफ झूठी धारणा बनाने को संवैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता। अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न्याय प्रशासन को बाधित करने तक नहीं बढ़ सकती।

हाईकोर्ट ने कहा,

“न्यायपालिका पर अपमानजनक और दुर्भावनापूर्ण हमलों को आलोचना के नाम पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि केजरीवाल और सिसोदिया ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करते समय महात्मा गांधी के “सत्याग्रह” का हवाला दिया, लेकिन अदालत में अनुपस्थित रहने के बावजूद सोशल मीडिया पर सक्रिय रहकर अदालत और जज के खिलाफ टिप्पणियां करते रहे।

जस्टिस शर्मा ने कहा कि राहत न मिलने के बाद संबंधित नेताओं ने निष्पक्ष आलोचना की सीमा पार कर अदालत के खिलाफ सार्वजनिक माहौल बनाने की कोशिश की।

अदालत ने कहा कि “सत्याग्रह” के नाम पर सोशल मीडिया के जरिए न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करने और जनता के मन में अदालत के प्रति अवमाननापूर्ण सोच पैदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

फैसले में यह भी कहा गया कि चाहे कोई आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे यह नहीं मानने दिया जा सकता कि वह सोशल मीडिया अभियान और कृत्रिम जनमत के जरिए भारतीय न्यायपालिका, उसके जजों या कानूनन स्थापित प्रक्रियाओं को आसानी से ध्वस्त कर सकता है।

अदालत ने कहा,

“कई बार जज को ऐसे मामलों में अकेले रास्ते पर चलना पड़ता है। अदालत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सार्वजनिक मंचों पर अपना बचाव नहीं कर सकती, भले ही व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जाए।”

अंत में अदालत ने कहा,

“यह अदालत न सहानुभूति चाहती है और न आलोचना से छूट। अदालत केवल जनता के संवैधानिक विश्वास पर चलती है और न्याय व्यवस्था को दूषित करने के प्रयासों से उसकी रक्षा करेगी।”

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