जजों के परिजनों के पेशे को आधार बनाकर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-22 06:33 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि जजों के बच्चों का सरकारी वकील पैनल में होना पक्षपात का आधार माना जाए तो देश के कई जजों को सुनवाई से खुद को अलग करना पड़ेगा।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह टिप्पणी आम आदमी पार्टी (AAP) प्रमुख अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने आबकारी नीति मामले की सुनवाई से जज के अलग होने की मांग की थी।

केजरीवाल ने आरोप लगाया कि जस्टिस शर्मा के बच्चों को केंद्र सरकार की ओर से कई मामलों में वकील के रूप में नियुक्त किया गया, जिससे हितों का टकराव उत्पन्न होता है। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा,

“यदि यह मान लिया जाए कि जज के परिवार का कोई सदस्य सरकारी पैनल में है तो जज को ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए तो ट्रायल कोर्ट्स से लेकर उच्चतम स्तर तक न्यायपालिका का बड़ा हिस्सा काम ही नहीं कर पाएगा।”

जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्षकार को यह दिखाना जरूरी होता है कि कथित संबंध का मामले के फैसले पर सीधा प्रभाव या संबंध है। इस मामले में ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जज के परिजनों की पेशेवर गतिविधियों का उस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और इससे जज की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

सोशल मीडिया पर चल रही बहसों पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा,

“न्यायिक फैसले कानून और रिकॉर्ड के आधार पर होते हैं न कि सोशल मीडिया की धारणाओं पर।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी पक्षकार को यह अधिकार नहीं है कि वह यह तय करे कि जज के परिवार के सदस्य अपना जीवन और पेशा कैसे चुनें।

अंत में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि जज ने अपने पद का दुरुपयोग कर परिवार को लाभ पहुंचाया है, तब तक ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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