गृहिणी निष्क्रिय नहीं, घरेलू योगदान के आर्थिक मूल्य को कानून में मान्यता मिलनी चाहिए: दिल्ली हाइकोर्ट

Update: 2026-02-20 08:06 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गृहिणी को निष्क्रिय मानना घरेलू योगदान की गलत समझ को दर्शाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू संबंधों में पत्नी के योगदान के आर्थिक मूल्य को कानून में मान्यता दी जानी चाहिए।

जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने कहा,

“गृहिणी 'निष्क्रिय नहीं बैठती; वह ऐसा श्रम करती है, जिससे कमाने वाला जीवनसाथी प्रभावी ढंग से काम कर सके। भरण-पोषण के दावों का निर्णय करते समय इस योगदान की अनदेखी करना अवास्तविक और अन्यायपूर्ण होगा।”

अदालत ने आगे कहा,

“कानून को केवल आय को ही नहीं बल्कि विवाह के दौरान घर और पारिवारिक संबंधों में पत्नी के योगदान के आर्थिक मूल्य को भी मान्यता देनी चाहिए।”

यह टिप्पणियां अदालत ने पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से उत्पन्न पारस्परिक पुनरीक्षण याचिकाओं पर निर्णय देते समय कीं। विवाद अंतरिम भरण-पोषण को लेकर था जो पत्नी और उनके नाबालिग दत्तक पुत्र के लिए मांगा गया।

रिकॉर्ड के अनुसार दोनों का विवाह वर्ष 2012 में हुआ। बाद में वे कुवैत चले गए जहां पति कार्यरत था। वर्ष 2020 में महामारी के दौरान वे भारत लौटे। पत्नी का आरोप था कि इसके बाद पति उसे और उनके नाबालिग पुत्र को छोड़कर पुनः विदेश चला गया।

पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 तथा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही शुरू की।

ट्रायल कोर्ट द्वारा पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किए जाने के आदेश को निरस्त करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि पत्नी शिक्षित है या कमाने में सक्षम है उसे अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि पत्नी स्वयं के भरण-पोषण और दैनिक खर्च के लिए पर्याप्त आय अर्जित कर रही थी। इसलिए वह अंतरिम भरण-पोषण की हकदार है।

अदालत ने कहा,

“जहां पत्नी कार्यरत नहीं है घर का प्रबंधन कर रही है, नाबालिग बच्चे और परिवार के बुजुर्गों की देखभाल कर रही है और पति की आय स्थिर तथा पर्याप्त है। वहां भरण-पोषण समानता के सिद्धांत पर आधारित होता है। ऐसे मामलों में भरण-पोषण का उद्देश्य दोनों पक्षों को यथासंभव समान स्तर पर रखना है ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।”

मामले का निस्तारण करते हुए अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि भरण-पोषण की कार्यवाहियां अक्सर अत्यधिक प्रतिद्वंद्वी स्वरूप ले लेती हैं। अदालत ने कहा कि जब फैमिली कोर्ट तक पहुंचते हैं तो पक्षकार इसे समाधान के बजाय जीत-हार की लड़ाई की तरह लेने लगते हैं।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कई बार पत्नी अपने मासिक खर्च को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करती है, जबकि पति अपनी आय कम बताने या आर्थिक अक्षमता का दावा करने की प्रवृत्ति रखता है। ऐसे में अदालतों को परस्पर विरोधी दावों के बीच तथ्य छांटने पड़ते हैं, जिससे मामलों का निस्तारण लंबित होता जाता है और इसका प्रतिकूल प्रभाव नाबालिग बच्चों पर भी पड़ता है।

इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि निरंतर मुकदमेबाजी के बजाय मध्यस्थता अधिक रचनात्मक मार्ग हो सकती है। अदालत के अनुसार मध्यस्थता सार्थक संवाद दोनों पक्षकारों की वास्तविक आवश्यकताओं और क्षमताओं के आकलन तथा पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान के लिए बेहतर मंच प्रदान करती है।

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