CCS पेंशन नियमों के तहत काम करने वाला कर्मचारी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत ग्रेच्युटी का दावा नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-03-07 13:57 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने माना कि ग्रेच्युटी देने वाले कानूनी नियमों (जैसे CCS (पेंशन) नियम) के तहत काम करने वाला कर्मचारी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 की धारा 2(e) के तहत “कर्मचारी” की परिभाषा से बाहर है, इसलिए वह 1972 एक्ट के तहत ग्रेच्युटी का दावा नहीं कर सकता। इसके अलावा यह भी माना गया कि इस्तीफा देने पर पिछली सर्विस खत्म हो जाएगी, इसलिए कर्मचारी पेंशन और ग्रेच्युटी का हकदार नहीं होगा।

पृष्ठभूमि के तथ्य

कर्मचारी को जुलाई 1995 में केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) में पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (हिस्ट्री) के तौर पर नियुक्त किया गया। उसने 13 साल से ज़्यादा सर्विस दी। फिर उसने पुरानी पीठ दर्द और लंबे समय तक खराब सेहत के कारण इस्तीफा दिया। अप्रैल 2009 में KVS ने उनका इस्तीफ़ा ऑफिशियली स्वीकार किया था।

बाद में उन्होंने अपने रिटायरमेंट बेनिफिट्स जारी करने की मांग की। KVS ने इन दावों को मना किया। इसने अपने बाय-लॉ नंबर 26 का इस्तेमाल किया, जो सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (पेंशन) रूल्स, 1972 के रूल 26 जैसा ही है, जिसमें कहा गया कि इस्तीफ़े का नतीजा पिछली सर्विस का नुकसान होता है। परेशान होकर कर्मचारी ने पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत कंट्रोलिंग अथॉरिटी से संपर्क किया, जिसने KVS को उनकी ग्रेच्युटी का पेमेंट करने का निर्देश दिया।

इसके बाद कर्मचारी ने अपने पेंशन क्लेम के लिए सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल से संपर्क किया। उसने बाय-लॉ की वैलिडिटी को चुनौती दी और पेंशन मांगी। ट्रिब्यूनल ने उनकी एप्लीकेशन खारिज कर दी। यह माना गया कि CCSP रूल्स के रूल 26 के अनुसार, इस्तीफ़े का नतीजा पिछली सर्विस का नुकसान होता है, इसलिए वह पेंशन बेनिफिट्स की हकदार नहीं थीं।

परेशान होकर कर्मचारी ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने रिट पिटीशन फाइल की।

कर्मचारी ने कहा कि पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 की धारा 4 में यह नियम है कि अगर किसी कर्मचारी ने कम से कम पांच साल तक लगातार सर्विस की तो इस्तीफ़ा देने पर भी वह ग्रेच्युटी के पेमेंट का हक़दार है। उसने 13 साल से ज़्यादा की सर्विस पूरी कर ली थी।

आगे यह भी कहा गया कि केंद्रीय विद्यालय संगठन, सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत रजिस्टर्ड सोसाइटी है। इसलिए यह पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत आता है। इसके अंदरूनी नियम, पार्लियामेंट के कानून से मिले कानूनी अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते।

यह कहा गया कि सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (पेंशन) रूल्स, 1972 पार्लियामेंट के एक्ट को ओवरराइड नहीं कर सकते। CCS पेंशन रूल्स का रूल 26, इस्तीफ़ा देने पर पिछली सर्विस ज़ब्त करने का नियम बनाता है, यह पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के सेक्शन 4 से मेल नहीं खाता। इसलिए इसे रेस्पोंडेंट-सोसाइटी के कर्मचारियों पर लागू नहीं किया जा सकता।

दूसरी तरफ, केंद्रीय विद्यालय संगठन ने कहा कि सर्विस में आने के समय कर्मचारी ने सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (पेंशन) रूल्स, 1972 को मान लिया था। इसलिए वह रूल 26 से बंधी थी, जो इस्तीफ़ा देने पर पिछली सर्विस ज़ब्त करने का नियम बनाता है।

कोर्ट के नतीजे

डिवीज़न बेंच ने देखा कि पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत “कर्मचारी” की परिभाषा में वह व्यक्ति शामिल नहीं है, जो केंद्र सरकार या राज्य सरकार के तहत कोई पद रखता है। इसके अलावा, इसमें वह व्यक्ति भी शामिल नहीं है, जो ग्रेच्युटी के पेमेंट के लिए किसी दूसरे एक्ट या नियमों के तहत आता हो। कोर्ट ने कहा कि जहां ग्रेच्युटी को एक अलग कानूनी ढांचे से रेगुलेट किया जाता है, वहाँ पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट लागू नहीं होगा।

यह भी देखा गया कि कर्मचारी की सर्विस की शर्तें सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (पेंशन) रूल्स, 1972 के तहत आती थीं, जिसे केंद्रीय विद्यालय संगठन ने अपनाया। कर्मचारी ने नौकरी में आने के समय 1972 के नियमों के तहत GPF-कम-पेंशन स्कीम चुनी थी। इसलिए पेंशन और ग्रेच्युटी का उसका हक CCS पेंशन नियमों से मिलता था, न कि पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत।

यह देखा गया कि रेस्पोंडेंट एक सोसाइटी है, जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत रजिस्टर्ड है, लेकिन उसकी सर्विस की शर्तें पूरी तरह से CCS पेंशन रूल्स के तहत रेगुलेट होती हैं, जिसमें ग्रेच्युटी का प्रोविज़न है।

यह माना गया कि एम्प्लॉई CCSP रूल्स 1972 के तहत आता है, जो ग्रेच्युटी का प्रोविज़न करता है। इसलिए वह पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत “एम्प्लॉई” की डेफिनिशन में नहीं आती है। इसलिए वह पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत ग्रेच्युटी क्लेम नहीं कर सकती है।

एन. मनोहरन बनाम एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट पर भरोसा करते हुए यह साफ़ किया गया कि जहां कोई एम्प्लॉई ग्रेच्युटी के प्रोविज़न वाले स्टैच्युटरी रूल्स (CCS पेंशन रूल्स) के तहत आता है तो ऐसे एम्प्लॉई को पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के दायरे से बाहर रखा जाएगा।

इसके अलावा, यूनियन ऑफ़ इंडिया एंड ऑर्स. बनाम ब्रज नंदन सिंह में जजमेंट पर भरोसा करते हुए यह देखा गया कि इस्तीफ़ा देने पर पिछली सर्विस ज़ब्त हो जाती है और पेंशनरी बेनिफिट्स के लिए कोई क्वालिफाइंग सर्विस नहीं बचती है। इसलिए इस्तीफ़े के असर से क्वालिफ़ाइंग सर्विस से जुड़े फ़ायदे बनाए रखने की कोई गुंजाइश नहीं बचती।

डिवीज़न बेंच ने माना कि कर्मचारी के इस्तीफ़े पर CCSP रूल्स का रूल 26 लागू होता है और उसकी पिछली सर्विस ज़ब्त हो जाती है। इसलिए वह ग्रेच्युटी के लिए एलिजिबल नहीं थी।

ऊपर बताई गई बातों के साथ ट्रिब्यूनल के ऑर्डर को डिवीज़न बेंच ने सही ठहराया। इसलिए कर्मचारी की फ़ाइल की गई रिट पिटीशन को डिवीज़न बेंच ने खारिज किया।

Case Name : Vimla Singh EX PGT History v. Commissioner, Kendriya Vidyalaya Sangathan

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