दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) से जुड़े कॉलेज को निर्देश दिया कि वह कॉलेज बदलने (माइग्रेशन) की मांग कर रहे चार छात्रों को 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) जारी करे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अनुरोधों पर फैसला लेते समय छात्र के घर और कॉलेज के बीच की दूरी एक महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है।
जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि हालांकि छात्रों के पास कॉलेज से दूसरे कॉलेज में जाने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है, लेकिन उनके अनुरोधों को मनमाने ढंग से खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने जोर देकर कहा,
"छात्र को यह चुनने का अधिकार है कि वह किस कॉलेज में पढ़ाई करना चाहता है।"
यह मामला तब सामने आया जब भगिनी निवेदिता कॉलेज में अंडरग्रेजुएट कोर्स कर रहे छात्रों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इन छात्रों ने अन्य DU कॉलेजों में जाने के लिए NOC मांगी थी, लेकिन कॉलेज ने इसे देने से इनकार किया था।
छात्रों ने अपने घर और कॉलेज के बीच की अधिक दूरी का हवाला देते हुए कहा कि रोज आना-जाना बहुत असुविधाजनक है और इससे उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं पैदा होती हैं। उन्होंने अपने घर के करीब वाले कॉलेजों में माइग्रेट करने की मांग की।
कोर्ट के सामने आई दूरियों के आंकड़ों से पता चला कि छात्रा को भगिनी निवेदिता कॉलेज पहुंचने के लिए लगभग 55 किमी का सफर तय करना पड़ता था, जबकि जिस कॉलेज में वह जाना चाहती थी, वह उसके घर से केवल 2.9 किमी दूर था। अन्य छात्रा को अपने मौजूदा कॉलेज तक जाने के लिए 72 किमी का सफर करना पड़ता था, जबकि उसका प्रस्तावित कॉलेज उसके घर से सिर्फ 2 किमी दूर था। बाकी दो छात्रों के मामले में यह दूरी क्रमशः 105 किमी और 38 किमी, तथा 48 किमी और 7 किमी थी।
याचिकाओं का विरोध करते हुए कॉलेज ने तर्क दिया कि अगर छात्रों को माइग्रेट करने की अनुमति दी गई तो कॉलेज में छात्रों की संख्या (एनरोलमेंट) कम हो जाएगी, जिससे कॉलेज के कामकाज पर ही संकट आ सकता है। कॉलेज ने बताया कि इस संस्थान की स्थापना महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए की गई, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और आस-पास के गांवों की महिलाओं के लिए।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि छात्रों के कम होने का कॉलेज का डर NOC देने से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं हो सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अगर इस तर्क को मान लिया जाए तो माइग्रेशन के हर अनुरोध को खारिज करना सही ठहराया जा सकता है। इससे एक ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी, जो पूरी तरह से मनमानी और अनुचित होगी।"
इसमें 'अमन इच्छपुनियानी बनाम वाइस चांसलर, दिल्ली विश्वविद्यालय' मामले में हाईकोर्ट के पिछले फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें यह माना गया कि माइग्रेशन (स्थानांतरण) के अनुरोधों पर विचार करते समय छात्र के निवास स्थान और शिक्षण संस्थान के बीच की दूरी एक महत्वपूर्ण कारक है।
अदालत ने 'हिमानी शर्मा बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय' मामले के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि कोई कॉलेज माइग्रेशन पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगा सकता, और प्रत्येक अनुरोध पर उसके अपने गुणों (मेरिट) के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने दोहराया कि माइग्रेशन अनुरोध को आगे भेजने के संबंध में कॉलेज के प्रधानाचार्य को जो विवेकाधिकार प्राप्त है, उसका इस्तेमाल उचित तरीके से किया जाना चाहिए, जिसमें छात्र के कल्याण और संस्थान के हितों, दोनों का ध्यान रखा जाए।
अदालत ने कहा,
"इसमें कोई संदेह नहीं है कि याचिकाकर्ताओं के पास माइग्रेशन के लिए एनओसी (NOC) मांगने का कोई निहित अधिकार नहीं है, लेकिन प्रतिवादी संख्या 2 (कॉलेज) भी इसे मनमाने ढंग से खारिज नहीं कर सकता है।"
याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अदालत ने कॉलेज को निर्देश दिया कि वह जल्द-से-जल्द NOC जारी करे।
Case Title : DIKSHA BOURAI & ORS. v. UNIVERSITY OF DELHI & ORS.