मानव तस्करी मामले में सोनू पंजाबन बरी, पीड़िता की गवाही पर दिल्ली हाईकोर्ट ने जताया संदेह

Update: 2026-03-25 11:49 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने मानव तस्करी और नाबालिग के यौन शोषण से जुड़े एक चर्चित मामले में गीता अरोड़ा उर्फ सोनू पंजाबन को बरी किया।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा और पीड़िता की गवाही भरोसेमंद नहीं पाई गई।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने अपने फैसले में कहा कि केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है लेकिन वह गवाही उच्च स्तर की और पूरी तरह विश्वसनीय होनी चाहिए।

अदालत ने कहा,

“इस मामले में गवाह की गवाही में कई विरोधाभास हैं और यह भरोसा पैदा नहीं करती।”

हाईकोर्ट ने पाया कि घटना के वर्ष को लेकर ही बड़ा विरोधाभास है। FIR और मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान में घटना 2006 की बताई गई जबकि बाद में सुनवाई के दौरान इसे 2009 बताया गया। अदालत ने कहा कि यह मामूली अंतर नहीं बल्कि मामले की जड़ को प्रभावित करने वाला गंभीर विरोधाभास है।

इसके अलावा पीड़िता ने सुनवाई के दौरान अपने बयान में कई नए आरोप जोड़े, जैसे नशीला पदार्थ देने और बेहोश करने की बात जो पहले के बयानों में नहीं थे।

अदालत ने यह भी नोट किया कि पीड़िता ने अलग-अलग आरोपियों की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग बयान दिए। कहीं कुछ लोगों पर शोषण का आरोप लगाया गया तो कहीं उन्हीं लोगों को मददगार बताया गया। अदालत ने ऐसे बयानों को एक-दूसरे को नष्ट करने वाले बताया।

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि तस्करी की कथित श्रृंखला में शामिल कई अहम लोगों की पहचान और गिरफ्तारी नहीं हो सकी, जिससे अभियोजन का मामला और कमजोर हो गया।

अदालत ने कहा,

“जांच में कमियां हमेशा आरोपी के पक्ष में नहीं जातीं लेकिन इस मामले में महत्वपूर्ण कड़ियों का न मिल पाना आरोपों को कमजोर करता है।”

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए और दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए सजा और दोषसिद्धि रद्द की।

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