दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र की MACPS के तहत ग्रेड पे-आधारित फाइनेंशियल अपग्रेडेशन को सही ठहराया
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की 'मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन स्कीम' (MACPS) को सही ठहराया। यह स्कीम अगली प्रमोशन वाली पोस्ट से जुड़े ग्रेड पे के बजाय, तुरंत अगले ऊंचे ग्रेड पे पर फाइनेंशियल अपग्रेडेशन देती है। [2026 LiveLaw (Del) 641]
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने उन याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें इस स्कीम को मनमाना और संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन करने वाला बताया गया।
कोर्ट ने कहा कि MACPS को सरकार ने छठे CPC (केंद्रीय वेतन आयोग) की सिफारिशों पर लागू किया। CPC एक एक्सपर्ट बॉडी है और इस क्षेत्र में विशेषज्ञता न होने के कारण अदालतों से इसमें दखल देने की उम्मीद नहीं की जाती है।
कोर्ट ने कहा,
"राज्य की पॉलिसी के मामले में अदालतें इस आधार पर दखल नहीं देतीं कि कोई बेहतर या समझदारी भरी पॉलिसी हो सकती है। राज्य को बदलती परिस्थितियों में और खासकर वित्तीय बाधाओं को देखते हुए अपनी पॉलिसी बदलने का अधिकार है।"
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जहां पहले की 'एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन स्कीम' (ACPS) अगली प्रमोशन वाली पोस्ट के ग्रेड पे के हिसाब से फाइनेंशियल अपग्रेडेशन देती थी, वहीं MACPS इस फायदे को पे-स्ट्रक्चर में तुरंत अगले ऊंचे ग्रेड पे तक ही सीमित कर देती है। उनके अनुसार, इससे फाइनेंशियल ठहराव (stagnation) की स्थिति फिर से पैदा हो गई और स्कीम का मकसद ही खत्म हो गया।
इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने सोच-समझकर प्रमोशन से जुड़े फाइनेंशियल अपग्रेडेशन मॉडल की जगह ग्रेड पे-आधारित सिस्टम अपनाया, ताकि सभी सेवाओं में एकरूपता बनी रहे और विसंगतियां खत्म हों।
आगे कहा गया,
"छठे CPC का मूल आधार यह था कि पहले की ACPS व्यवस्था, जो प्रमोशन स्ट्रक्चर से गहराई से जुड़ी थी, उसके कारण अलग-अलग विभागों में एक जैसी स्थिति वाले कर्मचारियों के लिए असमान नतीजे निकले। इससे कैडर के बीच असमानता और एक जैसे ठहराव के समय के बावजूद फाइनेंशियल प्रोग्रेशन में विसंगतियां पैदा हुईं।
इसलिए MACPS को खास तौर पर इस समस्या को दूर करने के लिए बनाया गया। इसमें ग्रेड पे स्ट्रक्चर के भीतर अपग्रेडेशन का एक समान और स्टैंडर्ड तरीका अपनाया गया, जिससे सेवाओं के बीच समानता सुनिश्चित हो सके और प्रमोशन से जुड़े फाइनेंशियल अपग्रेडेशन मॉडल में मौजूद स्ट्रक्चरल विसंगतियों को खत्म किया जा सके।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह पॉलिसी आर्टिकल 14 की शर्तों को पूरा करती है, क्योंकि यह एक तार्किक अंतर (intelligible differentia) पर आधारित है, जिसका ठहराव को दूर करने और प्रशासनिक एकरूपता सुनिश्चित करने के मकसद से सीधा और तार्किक संबंध है। इस प्रकार, याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
Case title: Ram Naresh Tiwari And Ors v. Union Of India And Ors.