दिल्ली हाईकोर्ट ने टेरिटोरियल आर्मी में अधिकारी भर्ती के दौरान पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग और असमान संख्या में पद निर्धारित किए जाने के आरोप वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। याचिका में आरोप लगाया गया कि पुरुष उम्मीदवारों के लिए बड़ी संख्या में पद रखे जाते हैं, जबकि महिला उम्मीदवारों के लिए केवल एक पद निर्धारित किया जा रहा है।

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने कुश कालरा की ओर से दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिका अधिवक्ता ओभिरूप घोष, रंगोली सेठ और रोहित के माध्यम से दायर की गई, जबकि वकील मोहित पॉल ने मामले में दलीलें रखीं।

याचिका में टेरिटोरियल आर्मी अधिकारी भर्ती को लैंगिक रूप से तटस्थ और योग्यता आधारित तरीके से आयोजित करने के लिए केंद्र सरकार तथा संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि महिलाओं के लिए केवल एक पद सीमित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 19(1)(जी) का उल्लंघन है।

कुश कालरा ने दिल्ली हाईकोर्ट के 5 जनवरी 2018 के अपने ही मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में हाईकोर्ट ने टेरिटोरियल आर्मी में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक माना था। कोर्ट ने तब कहा था कि टेरिटोरियल आर्मी अधिनियम, 1948 की धारा 6 में इस्तेमाल किया गया 'कोई भी व्यक्ति' शब्द पुरुष और महिला दोनों को शामिल करता है।

वर्तमान याचिका में आरोप लगाया गया कि 2018 के फैसले के बावजूद टेरिटोरियल आर्मी की भर्ती में पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए निर्धारित पदों के बीच बड़ा अंतर जारी है।

याचिका के अनुसार, 2022 की टेरिटोरियल आर्मी भर्ती अधिसूचना में पुरुष उम्मीदवारों के लिए 12 पद और महिला उम्मीदवारों के लिए केवल एक पद रखा गया। वर्ष 2023 में पुरुषों के लिए 18 और महिलाओं के लिए एक पद निर्धारित किया गया। इसी तरह 2025 में पुरुष उम्मीदवारों के लिए 18 पद और महिला उम्मीदवारों के लिए एक पद रखा गया तथा दोनों के लिए अलग-अलग मेरिट सूची बनाई गई।

याचिका में कहा गया कि 2026 की भर्ती अधिसूचना में भी पुरुष उम्मीदवारों के लिए 11 पद और महिला उम्मीदवारों के लिए केवल एक पद निर्धारित किया गया। इसमें भी पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग मेरिट क्रम रखे गए।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के अर्शनूर कौर मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया। याचिका के अनुसार, इस फैसले में सैन्य भर्ती में लैंगिक समानता के सिद्धांत को दोहराया गया और कहा गया कि जब किसी सशस्त्र बल की शाखा में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी जा चुकी है तो केवल नीति या संगठनात्मक आवश्यकताओं का हवाला देकर उनके लिए पदों की संख्या पर भेदभावपूर्ण सीमा नहीं लगाई जा सकती।

याचिका में दावा किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को वास्तविक रूप से लैंगिक तटस्थ और योग्यता आधारित तरीके से संचालित करने तथा जेंडर के आधार पर अलग-अलग मेरिट सूची के बजाय साझा मेरिट सूची के आधार पर चयन की बात कही।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि महिलाओं के लिए केवल एक पद निर्धारित करना उन्हें समान अवसर देने के बजाय महज औपचारिक प्रतिनिधित्व तक सीमित करने जैसा है। याचिका में कहा गया कि अलग-अलग और बहुत असमान संख्या में पद निर्धारित करने की यह व्यवस्था 2018 के कुश कालरा मामले में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े करती है।

याचिका में हाईकोर्ट से केंद्र और संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई कि टेरिटोरियल आर्मी अधिकारी भर्ती संविधान में समानता और भेदभाव-विरोधी गारंटी के अनुरूप कराई जाए तथा महिलाओं के खिलाफ पदों की संख्या पर किसी भेदभावपूर्ण सीमा के बिना साझा और योग्यता आधारित भर्ती प्रक्रिया अपनाई जाए।

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