नाबालिग सौतेली बेटियों से दुष्कर्म मामले में दोषी की सजा बरकरार, दिल्ली हाईकोर्ट ने की कड़ी टिप्पणी

Update: 2026-04-25 10:06 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग सौतेली बेटियों से दुष्कर्म के मामले में व्यक्ति की दोषसिद्धि और 15 वर्ष के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी। अदालत ने कहा कि पीड़िताओं के बयानों में मामूली विरोधाभास अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करते।

जस्टिस विमल कुमार यादव ने सुनवाई के दौरान पीड़िताओं की मां के आचरण पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मां ने बच्चियों के साथ हो रहे अत्याचार की जानकारी होने के बावजूद आवश्यक कदम नहीं उठाए।

अदालत ने कहा,

“प्रतीत होता है कि वह अत्यंत कठिन परिस्थिति में थी। उसने अपने पहले पति और बच्चियों के जैविक पिता को छोड़कर आरोपी के साथ रहना शुरू किया तथा उससे एक बच्ची भी हुई। संभवतः यही कारण था कि आरोपी के साथ उस पर भी आरोपपत्र दायर हुआ हालांकि बाद में निचली अदालत ने उसे बरी किया।”

यह टिप्पणी आरोपी की उस अपील को खारिज करते हुए की गई, जिसमें उसने निचली अदालत के दोषसिद्धि आदेश को चुनौती दी थी। आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की दुष्कर्म संबंधी धाराओं और पॉक्सो कानून के तहत दोषी ठहराया गया।

हाईकोर्ट ने आरोपी का यह तर्क अस्वीकार कर दिया कि पीड़िताओं के बयानों में असंगतियां हैं और मेडिकल चोटों के अभाव में मामला अविश्वसनीय है। अदालत ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में मामूली विसंगतियां स्वाभाविक होती हैं और उनसे विश्वसनीय गवाही पर असर नहीं पड़ता।

अदालत ने दोहराया कि यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद हो तो केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िताओं की गवाही विश्वसनीय है और स्वतंत्र गवाहों, मकान मालिक के हस्तक्षेप तथा फोरेंसिक साक्ष्यों से उसका समर्थन भी होता है।

अदालत ने कहा कि बच्चियां लगभग डेढ़ वर्ष से यौन उत्पीड़न झेल रही थीं।

ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि न पाते हुए हाइकोर्ट ने अपील खारिज की और दोषी को समर्पण करने का निर्देश दिया।

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