दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या वह सोशल मीडिया मंचों के ऐसे डिजाइन और फीचर्स को लेकर कोई नीति बनाने पर विचार कर रही है, जो यूजर्स का ध्यान लंबे समय तक बनाए रखने और उन्हें बार-बार मंच पर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं।

चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस अमित शर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा से इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने को कहा। कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए टाल दी।

यह जनहित याचिका कानून के प्रोफेसर डॉ. विकास कथूरिया ने दायर की है। याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के ऐसे डिजाइन की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई, जिनके बारे में याचिकाकर्ता का कहना है कि वे यूजर्स की सक्रियता बढ़ाने के साथ-साथ उनमें लत जैसी प्रवृत्ति पैदा कर सकते हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि क्या सरकार इस विषय पर कोई नीति बनाने पर विचार कर रही है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि फिलहाल उनके पास इस संबंध में कोई विशेष निर्देश नहीं हैं।

केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि याचिका में उठाया गया मुद्दा नीतिगत क्षेत्र से जुड़ा है। हालांकि, जब सरकार की ओर से याचिका को अभ्यावेदन के रूप में लेकर उस पर समयबद्ध तरीके से फैसला करने की बात कही गई तो कोर्ट ने सवाल किया कि वह सरकार को एक निश्चित समय सीमा में नीति बनाने के लिए कैसे कह सकता है। पीठ ने केंद्र से इस मुद्दे पर सरकार के रुख की जानकारी लेने को कहा।

याचिका में सोशल मीडिया के ऐसे कई फीचर्स का उल्लेख किया गया, जिनमें लगातार नीचे की ओर सामग्री देखते जाने की सुविधा, अपने आप वीडियो चलना, व्यक्तिगत पसंद के आधार पर सामग्री दिखाना, बार-बार आने वाली सूचनाएं और 'लाइक' जैसी प्रतिक्रिया सुविधाएं शामिल हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि उसका उद्देश्य सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि उन डिजाइन सुविधाओं पर ध्यान देना है, जिन्हें यूजर्स का ध्यान खींचने, बनाए रखने और बार-बार सक्रिय करने के लिए तैयार किया गया।

याचिका में दावा किया गया कि इन सुविधाओं का विशेष रूप से युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। इसमें चिंता, अवसाद, आत्मसम्मान में कमी, साइबर उत्पीड़न से जुड़ा तनाव और लगातार सोशल मीडिया देखते रहने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया।

याचिका में केंद्र सरकार से ऐसे डिजाइन फीचर्स की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने और उसके आधार पर वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित सुरक्षा मानक तैयार करने की मांग की गई। इसके अलावा जरूरत के अनुसार इन सुविधाओं को सीमित, प्रतिबंधित या नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने की मांग भी की गई।

मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों के अलावा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और सोशल मीडिया कंपनियों को भी पक्षकार बनाया गया।

याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों से कथित नुकसान के लिए मुआवजे की मांग भी की गई। हालांकि, बुधवार की सुनवाई में हाईकोर्ट का मुख्य सवाल केंद्र सरकार के इस मुद्दे पर संभावित नीतिगत रुख को लेकर रहा।

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