दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी व्यक्तियों और पेशेवरों के डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के लिए इस्तेमाल होने वाले FIPS 140-2 टोकन को लेकर 21 सितंबर 2026 की समयसीमा पर केंद्र सरकार को अभ्यावेदन पर फैसला करने का निर्देश दिया।

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने केंद्र से कहा कि अधिवक्ता रामकिशन सरस्वत के अभ्यावेदन पर 20 सितंबर तक फैसला लिया जाए।

खंडपीठ ने इस मामले में एकल जज के 31 अगस्त के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। सिंगल जज ने केंद्र सरकार को अभ्यावेदन पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया।

रामकिशन सरस्वत ने आरोप लगाया कि अदालत के निर्देश के बावजूद जून में दिया गया उनका अभ्यावेदन अब तक तय नहीं किया गया है। इसके बाद उन्होंने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की थी।

कोर्ट ने कहा,

“सिंगल जज के आदेश में हस्तक्षेप किए बिना हम इस अपील का निपटारा करते हैं और प्रतिवादियों को निर्देश देते हैं कि वे याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर 20 सितंबर तक विचार कर फैसला लें।”

सरस्वत का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दाखिल होने वाले दस्तावेजों तथा विभिन्न वैधानिक, न्यायिक, नियामकीय और वित्तीय लेनदेन के लिए उन्हें FIPS मान्य यूएसबी क्रिप्टोग्राफिक टोकन का इस्तेमाल करना पड़ता है।

उन्होंने इस साल जनवरी में जारी परामर्श को चुनौती दी है। उनका दावा है कि इसके तहत निजी या व्यावसायिक संस्थाओं और व्यक्तिगत पेशेवरों को 21 सितंबर 2026 तक FIPS 140-2 टोकन से नए टोकन पर स्थानांतरित होने को कहा गया। वहीं सरकारी संगठनों को जोखिम आकलन या छूट की व्यवस्था के जरिए 21 सितंबर 2029 तक इन टोकन का इस्तेमाल जारी रखने की अनुमति दी गई।

सरस्वत ने यह भी दावा किया कि संबंधित परामर्श में खुद दर्ज है कि FIPS 140-2 मॉड्यूल के लगातार इस्तेमाल से जुड़ी कोई ज्ञात सुरक्षा कमजोरी नहीं है। उनका तर्क है कि ऐसी स्थिति में निजी यूजर्स के लिए सरकारी संगठनों की तुलना में तीन साल पहले की समयसीमा तय करने का कोई तार्किक आधार नहीं है।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि अलग-अलग समयसीमा तय करने से पहले पर्याप्त परामर्श, नियामकीय प्रभाव का आकलन और लागत-लाभ का विश्लेषण नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सरकारी उपयोगकर्ताओं को अलग समयसीमा दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल करने वाले सभी उपयोगकर्ताओं को समान स्तर पर देखा जाना चाहिए।

खंडपीठ ने मौखिक रूप से पूछा,

“डिजिटल हस्ताक्षर का हर उपयोगकर्ता एक ही स्तर पर होना चाहिए। इसका इस्तेमाल करने वाले सरकारी कर्मचारियों को भी वही कठिनाइयां होंगी। फिर इसका क्या औचित्य है? इन दोनों श्रेणियों के बीच समझने योग्य अंतर क्या है?”

हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया और केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर तय समयसीमा में फैसला करने का निर्देश देते हुए अपील का निपटारा किया।

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