दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का आदेश रद्द किया। इस आदेश में हाईकोर्ट के जन सूचना अधिकारी (PIO) को ऐसे मामलों का विवरण खोजने और सार्वजनिक करने के लिए कहा गया था, जिनमें फैसले सुरक्षित तो रख लिए गए थे, लेकिन दो महीने के भीतर सुनाए नहीं गए।
जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि CIC, PIO को केवल इस धारणा के आधार पर ऐसी जानकारी खोजने का निर्देश नहीं दे सकता कि यह जानकारी कोर्ट मास्टर्स या चीफ जस्टिस के ऑफिस के पास "उपलब्ध होनी चाहिए"।
कोर्ट ने 29 अक्टूबर को यह आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने PIO द्वारा दायर उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें CIC के 26 मई, 2011 के आदेश को चुनौती दी गई।
यह मामला अप्रैल 2009 में पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता द्वारा दायर एक RTI आवेदन से शुरू हुआ था। गुप्ता ने उन सभी मामलों का विवरण मांगा था, जिनकी सुनवाई तत्कालीन जस्टिस ए.के. सिकरी ने (चाहे अकेले या डिवीजन बेंच के हिस्से के रूप में) की थी, और जिनमें बहस पूरी होने के दो महीने से अधिक समय बाद फैसले सुनाए गए।
गुप्ता ने अपने खुद का उदाहरण दिया, जिसमें 31 जुलाई, 2007 को बहस पूरी हुई थी, लेकिन फैसला 2 मई, 2008 को सुनाया गया।
शुरुआत में PIO ने गुप्ता को बताया कि ऐसा कोई डेटा अलग से नहीं रखा जाता है और न ही संकलित किया जाता है। प्रथम अपीलीय प्राधिकरण ने भी इस जवाब को सही ठहराया।
हालांकि, CIC ने गुप्ता की दूसरी अपील को स्वीकार करते हुए PIO को संबंधित रिकॉर्ड खोजने का निर्देश दिया। इसमें वे मासिक रिपोर्टें भी शामिल थीं, जिन्हें कोर्ट मास्टर्स रजिस्ट्रार के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश को सौंपते थे। CIC ने इन संबंधित सूचियों की प्रतियां उपलब्ध कराने को कहा।
CIC ने इस जानकारी को RTI आवेदन से पहले के दो वर्षों तक ही सीमित रखा था। आयोग ने माना कि जस्टिस सिकरी के पूरे कार्यकाल का डेटा संकलित करना एक असंभव काम होगा और इससे सार्वजनिक प्राधिकरण के संसाधनों का बहुत अधिक और अनावश्यक उपयोग होगा।
हाईकोर्ट के सामने, PIO ने तर्क दिया कि मांगी गई जानकारी कोर्ट के किसी भी अधिकारी द्वारा न तो रखी जाती है और न ही संकलित की जाती है। यह भी कहा गया कि मासिक रिपोर्टें मुख्य न्यायाधीश को एक सीलबंद लिफाफे में सौंपी जाती थीं और इन्हें एक 'फिड्यूशियरी' (भरोसे/विश्वास पर आधारित) क्षमता के तहत रखा जाता है।
जस्टिस महाजन ने बताया कि 'अनिल राय बनाम बिहार राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल 2003 को आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत कोर्ट मास्टर्स को उन मामलों की मासिक सूची देनी होती थी, जिनमें फैसले सुरक्षित तो रख लिए गए, लेकिन उस महीने के दौरान सुनाए नहीं गए।
इन सूचियों को सीलबंद लिफाफे में रजिस्ट्रार (प्रशासन-न्यायिक) के पास जमा करना होता था, ताकि उन्हें चीफ जस्टिस के सामने पेश किया जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न तो 'अनिल राय' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में और न ही हाईकोर्ट के आदेश में यह कहा गया कि इन सूचियों को जज के हिसाब से अलग-अलग रखा या संकलित किया जाए।
'सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन बनाम आदित्य बंदोपाध्याय' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि RTI Act के तहत केवल वही जानकारी मांगी जा सकती है जो किसी सार्वजनिक प्राधिकरण (पब्लिक अथॉरिटी) के पास पहले से मौजूद है।
कोर्ट ने कहा कि अगर मांगी गई जानकारी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं है और किसी कानून के तहत उसे बनाए रखना जरूरी नहीं है तो सार्वजनिक प्राधिकरण ऐसी जानकारी को इकट्ठा या संकलित करने के लिए बाध्य नहीं है।
इसके अलावा, कोर्ट ने 'रजिस्ट्रार, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया बनाम कमोडोर लोकेश के. बत्रा' मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले का भी जिक्र किया। इस फैसले में कहा गया था कि RTI Act अधिकारियों को इस बात के लिए अधिकृत नहीं करता कि वे आवेदक द्वारा मांगी गई तरह से जानकारी को संकलित करें।
जस्टिस महाजन ने कहा कि गुप्ता द्वारा मांगी गई जानकारी देने के लिए PIO को किसी विशेष जज द्वारा सुने गए सभी मामलों के रिकॉर्ड की जांच करनी होगी, हर मामले में लगे समय का हिसाब लगाना होगा और एक नई सूची तैयार करनी होगी।
कोर्ट ने कहा, "यह जानकारी को इकट्ठा और संकलित करने जैसा होगा," और जोड़ा कि RTI अधिनियम किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसा काम करने के लिए बाध्य नहीं करता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जानकारी को केवल दो साल की अवधि तक सीमित कर दिया जाए, तो भी इस काम की प्रकृति नहीं बदलेगी।
हालांकि कोर्ट ने माना कि समय पर फैसले सुनाना जनहित का विषय है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि जनहित का हवाला देकर किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसी जानकारी बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसके पास पहले से मौजूद ही नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"ऊपर की गई चर्चा को देखते हुए वर्तमान याचिका स्वीकार की जाती है।"
इसके साथ ही कोर्ट ने 26 मई 2011 को दिया गया CIC का आदेश रद्द किया।
Case Title : PUBLIC INFORMATION OFFICER v. P.D.GUPTA