लिव-इन संबंध का सहारा लेकर झूठे शादी के वादे से नहीं बच सकता आरोपी: दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की अग्रिम जमानत

Update: 2026-04-16 08:24 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई आरोपी यह कहकर खुद को बचा नहीं सकता कि वह पहले से किसी महिला के साथ केवल लिव-इन संबंध में था इसलिए उस पर झूठे शादी के वादे का आरोप लागू नहीं होता।

जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा ने यह टिप्पणी करते हुए एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।

मामला उस आरोप से जुड़ा है, जिसमें अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी ने विवाह का झूठा वादा कर पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में पीड़िता को पता चला कि आरोपी पहले से ही एक अन्य महिला के साथ रह रहा था और उसके दो बच्चे भी हैं, जिसकी जानकारी उससे छिपाई गई।

राज्य की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता की सहमति आरोपी द्वारा किए गए धोखे और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के कारण प्राप्त की गई, इसलिए यह सहमति वैध नहीं मानी जा सकती।

वहीं, आरोपी ने तर्क दिया कि उसका संबंध सहमति से था और वह दूसरी महिला के साथ केवल लिव-इन में था कानूनी रूप से विवाहित नहीं था।

अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा,

“यह तर्क स्वीकार्य नहीं है कि केवल लिव-इन संबंध होने से शादी के झूठे वादे का आरोप समाप्त हो जाता है। यदि महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए हैं तो धोखे का आरोप बना रहता है।”

अदालत ने यह भी पाया कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा था और नोटिस के बावजूद जांच में शामिल नहीं हुआ। साथ ही पहले की कार्यवाही में अदालत को गुमराह करने का प्रयास भी किया।

इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता और उसकी याचिका खारिज की।

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