दिल्ली हाईकोर्ट ने DRT के पूर्व पीठासीन अधिकारी की निलंबन के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका खारिज की, कहा- पिछले फैसले में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में चंडीगढ़ स्थित 'डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल' (DRT) के एक पूर्व पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका खारिज की। इस याचिका में उस पिछले फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें अधिकारी के निलंबन और निलंबन की अवधि बढ़ाए जाने के खिलाफ उनकी अपील को ठुकरा दिया गया।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ (Division Bench) ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं मिली, जिसके आधार पर पिछले फैसले पर पुनर्विचार किया जा सके।
कोर्ट ने गौर किया कि अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के परिणामस्वरूप उन्हें सेवा से हटा दिया गया, जिससे निलंबन आदेशों को चुनौती देने का मामला अब बेमानी (Infructuous) हो गया।
यह मामला तब शुरू हुआ, जब चंडीगढ़ की 'DRT बार एसोसिएशन' ने शिकायत की कि उक्त अधिकारी ने बार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया और मामलों की सुनवाई को अनावश्यक रूप से बहुत लंबे समय के लिए टाल दिया (Adjourn किया)। इन शिकायतों के बाद केंद्र सरकार ने 13 फरवरी 2024 को उन्हें निलंबित कर दिया और उनके खिलाफ आरोप-पत्र (Chargesheet) जारी करके अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की।
अधिकारी ने हाईकोर्ट में निलंबन आदेश, आरोप-पत्र और जांच अधिकारी (Inquiry Officer) की नियुक्ति को चुनौती दी। उन्होंने अपने निलंबन की अवधि बढ़ाए जाने को भी चुनौती दी और तर्क दिया कि उनका निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) उनके अंतिम वेतन के 50% से अधिक नहीं बढ़ाया गया।
सितंबर 2025 में सिंगल जज ने उनकी याचिकाओं को खारिज किया। इसके बाद अगस्त 2026 में खंडपीठ ने भी उनकी अपील खारिज की और कहा कि सेवा से हटाए जाने के बाद निलंबन आदेशों को चुनौती देने का मामला बेमानी हो गया। इसके बाद अधिकारी ने इस फैसले पर पुनर्विचार (Review) की मांग करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
खंडपीठ के समक्ष अधिकारी ने तर्क दिया कि पिछले फैसले में उनके लिखित सबमिशन और मुख्य दलीलों पर विचार नहीं किया गया, जिसमें निर्वाह भत्ता बढ़ाने का उनका दावा भी शामिल था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सेवा से हटाए जाने के बाद भी निलंबन आदेशों को चुनौती देने का मामला बना रहता है, क्योंकि इन आदेशों के अलग-अलग कानूनी परिणाम होते हैं।
इन दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार याचिका (Review Petition) का इस्तेमाल अपील के रूप में नहीं किया जा सकता। इसमें बताया गया कि 'कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1908' के 'ऑर्डर XLVII नियम 1' के तहत 'रिव्यू ज्यूरिसडिक्शन' (पुनर्विचार का अधिकार क्षेत्र) केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है, जिनमें कोई नया और महत्वपूर्ण सबूत सामने आया हो, या रिकॉर्ड में कोई ऐसी गलती हो जो साफ तौर पर दिखाई दे रही हो।
कोर्ट ने कहा,
"रिकॉर्ड में दिखने वाली गलती ऐसी होनी चाहिए जो अपने आप स्पष्ट हो और जिसे समझने के लिए बहुत अधिक तर्क-वितर्क की जरूरत न पड़े।"
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि 'रिव्यू' की कार्यवाही का इस्तेमाल किसी मामले के गुण-दोषों का फिर से मूल्यांकन करने या एक राय की जगह दूसरी राय रखने के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि जांच के दौरान 'सस्पेंशन' (निलंबन) एक अंतरिम कदम है, जिसका उद्देश्य अनुशासनात्मक कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाना होता है। एक बार जब जांच पूरी हो जाती है और अधिकारी को सेवा से हटा दिया जाता है तो सस्पेंशन ऑर्डर का स्वतंत्र अस्तित्व खत्म हो जाता है।
कोर्ट ने कहा,
"अपीलकर्ता का यह तर्क कि सस्पेंशन ऑर्डर और उसके विस्तार (एक्सटेंशन) के आदेश की अलग-अलग जांच होनी चाहिए, असल में मामले के गुण-दोषों पर दिए गए फैसले पर फिर से विचार करने की मांग है, जिसकी 'रिव्यू' कार्यवाही में अनुमति नहीं है।"
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारी द्वारा सेवा से हटाए जाने के खिलाफ चुनौती पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में लंबित है और जांच रिपोर्ट से जुड़े आधारों पर वहां विचार किया जा सकता है।
इस प्रकार, कोर्ट ने 'रिव्यू पिटीशन' (पुनर्विचार याचिका) खारिज की।
Case Title : M.M. DHONCHAK v. UNION OF INDIA