कानूनी स्थिति जाने बिना FIR दर्ज कराने की याचिका दायर करना दुर्भाग्यपूर्ण : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने FIR दर्ज कराने की मांग को लेकर दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील की कड़ी आलोचना की। अदालत ने कहा कि स्थापित कानूनी स्थिति की जांच किए बिना ऐसी याचिका दायर करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने आशानंद सैनी द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में FIR दर्ज करने, जांच को पुलिस उपायुक्त (सतर्कता) की निगरानी में किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने और कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने की मांग की गई।
सुनवाई की शुरुआत में ही अदालत ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया और याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि किस कानूनी आधार पर आपराधिक रिट याचिका में इस तरह की मांगें की जा सकती हैं।
अदालत ने कहा कि बार-बार पूछे जाने के बावजूद वकील केवल यह सामान्य शिकायत दोहराते रहे कि पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की और यह सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में नागरिक आखिर कहां जाएं।
इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस कठपालिया ने कहा,
“यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि वकील ने यह रिट याचिका दायर करने से पहले कानूनी स्थिति की जांच करना उचित नहीं समझा।”
अदालत ने वकील का ध्यान सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुजल विश्वास अट्टावर बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (2026) की ओर दिलाया, जिसमें FIR दर्ज नहीं होने की स्थिति में उपलब्ध कानूनी उपायों को स्पष्ट किया गया।
हाईकोर्ट ने जांच को दूसरी एजेंसी को सौंपने की मांग भी खारिज की। अदालत ने कहा कि वकील शायद इस गलतफहमी में हैं कि केवल शिकायत देने भर से, प्राथमिकी दर्ज हुए बिना भी जांच शुरू हो जाती है।
पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग पर अदालत ने कहा कि ऐसा राहत आदेश भी आपराधिक रिट याचिका के दायरे में नहीं आता।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह याचिका “सिर्फ आधारहीन ही नहीं बल्कि शरारतपूर्ण प्रयास” भी प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले से दर्ज FIR का जवाब देना था।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।