दिल्ली हाईकोर्ट ने वकीलों के माता-पिता को सीएम एडवोकेट्स वेलफेयर स्कीम का फायदा देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया

Update: 2026-01-14 13:18 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (14 जनवरी) को चीफ मिनिस्टर एडवोकेट्स वेलफेयर स्कीम के फायदे योग्य वकीलों के माता-पिता तक बढ़ाने की मांग वाली PIL पर सुनवाई से इनकार किया।

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने कहा कि इस मामले में मैंडमस जारी नहीं किया जा सकता। साथ ही दो पक्षकारों के बीच कॉन्ट्रैक्ट की आज़ादी का हवाला दिया, जिनमें से एक दिल्ली सरकार है।

कोर्ट ने फर्स्ट जेनरेशन लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिसमें स्कीम के तहत परिवार की परिभाषा से माता-पिता को शामिल न करने का मुद्दा उठाया गया था।

एसोसिएशन की ओर से पेश हुए वकील रुद्र विक्रम सिंह ने कहा कि स्कीम के क्लॉज़ 3 के अनुसार, सिर्फ़ योग्य वकीलों के पति/पत्नी और बच्चे ही स्कीम का फायदा उठा सकते हैं, माता-पिता नहीं।

यह स्कीम वकीलों को 10 लाख रुपये का टर्म लाइफ कवर देती है। यह परिवार (वकील, पति/पत्नी, 25 साल तक के दो बच्चे) को 5 लाख रुपये का मेडिकल इंश्योरेंस भी देती है, जिसमें कैशलेस सुविधा और पहले से मौजूद बीमारियों का कवरेज शामिल है। दिल्ली सरकार पूरा इंश्योरेंस प्रीमियम देती है।

शुरुआत में कोर्ट ने सिंह से पूछा कि मांगी गई दिशा या मैंडमस कैसे जारी किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

“यह सरकार और इंश्योरेंस कंपनी के बीच एक समझौता है। कॉन्ट्रैक्ट की आज़ादी नाम की एक अवधारणा है। क्या दो व्यक्तियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट में प्रावधान रखने के लिए पार्टियों को निर्देश देते हुए मैंडमस जारी किया जा सकता है?”

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की,

“क्या दो स्वतंत्र पार्टियों को किसी समझौते पर आने के लिए मजबूर किया जा सकता है? उन्होंने अपनी मर्ज़ी से इंश्योरेंस कंपनी के साथ समझौता किया ताकि स्कीम का फायदा सिर्फ़ परिवार के कुछ खास सदस्यों को दिया जा सके। क्या कोर्ट उनसे माता-पिता और दादा-दादी को भी फायदा देने के लिए कह सकता है?... यह इंश्योरेंस कंपनी और सरकार को आपस में तय करना है। हम ऐसा नहीं कर सकते। यह कॉन्ट्रैक्ट की आज़ादी है।”

दिल्ली सरकार के वकील समीर वशिष्ठ ने कोर्ट को बताया कि मांगा गया मैंडमस जारी नहीं किया जा सकता और इस मामले में कई रुकावटें हैं, क्योंकि माता-पिता को इंश्योरेंस फायदे देने वाली नीतियां अलग हैं।

कोर्ट ने सिंह से कहा कि हर मनचाही चीज़ मैंडमस जारी करने का विषय नहीं हो सकती, जो सिर्फ़ कानूनी कर्तव्यों के पालन में विफलता के मामले में जारी किया जाता है।

इसके बाद सिंह ने दिल्ली सरकार से रिप्रेजेंटेशन के ज़रिए संपर्क करने की आज़ादी के साथ याचिका वापस लेने पर सहमति जताई। उन्हें यह आज़ादी देते हुए बेंच ने कहा कि संबंधित सरकारी विभाग कानून के अनुसार रिप्रेजेंटेशन पर फैसला करे और वह वहां अपने सभी उपलब्ध तर्क पेश कर सकते हैं।

Title: First Generation Lawyers Association v. GNCTD & Ors

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