कर्मचारी के हस्ताक्षरित वेतन पुनर्गठन पत्र से ऊपर नहीं हो सकता कंपनी का आंतरिक पत्राचार: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि कंपनी के भीतर होने वाला आंतरिक पत्राचार किसी कर्मचारी द्वारा हस्ताक्षरित वेतन पुनर्गठन पत्र की स्पष्ट शर्तों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
अदालत ने पूर्व कर्मचारी की अपील खारिज की, जिसमें उसने कथित रूप से रोके गए वेतन और क्षतिपूर्ति बोनस की वसूली की मांग की थी।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने निचली अदालत द्वारा वसूली वाद खारिज किए जाने का निर्णय बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सकी कि कंपनी ने कम किए गए वेतन के हिस्से को भविष्य में लौटाने या अतिरिक्त बोनस देने का कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी आश्वासन दिया।
मामले के अनुसार अपीलकर्ता ने वर्ष 1993 में संबंधित कंपनी में नौकरी शुरू की थी और जुलाई 2004 में इस्तीफा दे दिया था। उसका दावा था कि वित्तीय वर्ष 2002-03 के दौरान कंपनी ने आर्थिक कठिनाइयों का हवाला देते हुए वरिष्ठ कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा अस्थायी रूप से रोक लिया था।
साथ ही यह आश्वासन दिया गया था कि 1 अप्रैल 2003 से यह राशि वापस कर दी जाएगी और एक माह के वेतन के बराबर बोनस भी दिया जाएगा।
इसी आधार पर उसने कथित रूप से रोके गए वेतन, बोनस, ब्याज और अन्य सेवा लाभों सहित लगभग 3.10 लाख रुपये की वसूली की मांग की।
वहीं कंपनी का कहना था कि वेतन को रोका नहीं गया, बल्कि कारोबारी परिस्थितियों के कारण वेतन संरचना में अस्थायी बदलाव किया गया। कंपनी ने यह भी कहा कि कम किए गए वेतन को बाद में लौटाने संबंधी कोई समझौता नहीं हुआ और कर्मचारी ने बिना किसी आपत्ति के इस व्यवस्था को स्वीकार कर लिया था।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद उस पत्र का उल्लेख किया, जिस पर अपीलकर्ता के हस्ताक्षर थे। अदालत ने पाया कि इस पत्र में वेतन व्यवस्था को स्पष्ट रूप से "पुनर्गठन" और "अंतरिम उपाय" बताया गया। इसमें कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि कम किया गया वेतन भविष्य में वापस किया जाएगा।
अपीलकर्ता ने अपने पक्ष में कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा मानव संसाधन विभाग के उपाध्यक्ष को भेजे गए एक ई-मेल का हवाला दिया, जिसमें "स्थगित वेतन" शब्द का प्रयोग किया गया।
हालांकि अदालत ने कहा कि यह केवल कंपनी के भीतर का आंतरिक पत्राचार है, जिसे न तो अपीलकर्ता को संबोधित किया गया और न ही उस पर उसके हस्ताक्षर हैं। इसलिए इसे कंपनी द्वारा कर्मचारी को दिया गया औपचारिक आश्वासन नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि कंपनी की ओर से कम किए गए वेतन को भविष्य में लौटाने संबंधी कोई लिखित समझौता, निदेशक मंडल का प्रस्ताव या कोई अन्य समकालीन दस्तावेज रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है।
इसके अलावा, जिरह के दौरान अपीलकर्ता ने स्वीकार किया कि उसने वेतन पुनर्गठन के खिलाफ कभी लिखित आपत्ति दर्ज नहीं कराई। वह ऐसा कोई दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि किसी अन्य कर्मचारी को कथित स्थगित वेतन का भुगतान किया गया हो।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी के हस्ताक्षरित वेतन पुनर्गठन पत्र की स्पष्ट शर्तों के विपरीत केवल आंतरिक ई-मेल के आधार पर कोई दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने अपील खारिज की और पूर्व कर्मचारी को किसी भी अतिरिक्त राशि या बोनस का दावा देने से इनकार किया।