आपराधिक मुकदमे में विभागीय निष्कर्ष प्राथमिक साक्ष्य का विकल्प नहीं हो सकते: जाली समन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रक्रिया सर्वर को आरोपमुक्त किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक प्रक्रिया सर्वर को आरोपमुक्त कर दिया है, जिस पर यह आरोप था कि उसने झूठी तामील रिपोर्ट (false service report) तैयार कर एक एकतरफा (ex parte) तलाक डिक्री दिलवाने में मदद की। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री आरोप तय करने के लिए आवश्यक “गंभीर संदेह” (grave suspicion) को पूरा नहीं करती।
जस्टिस अमित महाजन ने नरेंद्र सिंह द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (MM) द्वारा पारित आरोपमुक्ति के आदेश को पलट दिया गया था। नरेंद्र सिंह पर धारा 193 IPC (झूठा साक्ष्य देने का दंड) के तहत आरोप लगाए गए थे।
अभियोजन का मामला
अभियोजन के अनुसार, याचिकाकर्ता जब तीस हजारी अदालतों की नज़ारत शाखा में प्रक्रिया सर्वर के पद पर तैनात था, तब उसने जयपुर कोर्ट द्वारा जारी समन में अलग स्याही और हस्तलेखन में “साकेत” शब्द जोड़ दिया। आरोप था कि उसने समन स्वयं को मार्क कर लिया, ताकि तामील की प्रक्रिया अपने ही हाथ में रख सके।
यह भी आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता-पत्नी को व्यक्तिगत रूप से समन तामील करने के बजाय, समन उसके पति पंकज को सौंप दिया गया, जिसने कथित रूप से शिकायतकर्ता से धोखे से हस्ताक्षर करवा लिए। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अदालत में झूठी तामील रिपोर्ट दाखिल की, जिसके आधार पर वर्ष 2002 में एकतरफा तलाक डिक्री पारित हुई।
जांच और निचली अदालतों की कार्यवाही
गौरतलब है कि जांच एजेंसी ने प्रारंभ में पूरक आरोपपत्र दाखिल कर याचिकाकर्ता को “क्लीन चिट” दी थी, यह कहते हुए कि अभियोजन के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है। हालांकि, MM ने जांच एजेंसी की राय से असहमति जताते हुए याचिकाकर्ता को तलब किया, लेकिन बाद में 2012 में यह पाते हुए उसे आरोपमुक्त कर दिया कि मूल समन न तो जब्त किया गया और न ही अदालत के समक्ष पेश किया गया।
इसके विपरीत, ASJ ने 2013 में आरोपमुक्ति को पलट दिया, यह कहते हुए कि विभागीय कार्यवाही में याचिकाकर्ता को दुराचार (misconduct) का दोषी पाया गया था और वहाँ मूल रिकॉर्ड देखे गए थे।
हाईकोर्ट के अवलोकन
हाईकोर्ट ने ASJ के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि विभागीय कार्यवाही के निष्कर्षों को आपराधिक मुकदमे में ठोस साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्यवाही “संभावनाओं के संतुलन” (preponderance of probabilities) पर आधारित होती है, जबकि आपराधिक मुकदमे में “संदेह से परे प्रमाण” (proof beyond reasonable doubt) आवश्यक होता है।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जिस मूल समन पर कथित जालसाजी का आरोप था, वह न तो जब्त किया गया और न ही रिकॉर्ड पर पेश किया गया।
कोर्ट ने कहा:
“मूल समन के अभाव में, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह झूठे साक्ष्य का आधार है, अभियोजन की नींव स्वभावतः कमजोर हो जाती है।”
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि शिकायतकर्ता ने अपने पति के खिलाफ चले मुख्य मुकदमे (धारा 376/493 IPC) में यह स्वीकार किया था कि समन पर हस्ताक्षर और लेखन उसी का है, और उस मुकदमे में पति को बरी कर दिया गया था। ट्रायल कोर्ट ने यह भी दर्ज किया था कि शिकायतकर्ता को तलाक कार्यवाही की जानकारी थी और उसने स्वेच्छा से हस्ताक्षर किए थे।
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि जयपुर फैमिली कोर्ट द्वारा पारित एकतरफा तलाक डिक्री को शिकायतकर्ता ने सीमावधि के भीतर कभी चुनौती नहीं दी, जिससे यह डिक्री अंतिम हो गई। कोर्ट के अनुसार, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि कथित तामील से शिकायतकर्ता को कोई वास्तविक पूर्वाग्रह (prejudice) नहीं हुआ।
निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि ASJ ने पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए एक सुविचारित आरोपमुक्ति आदेश में हस्तक्षेप किया, जबकि वह न तो मनमाना था और न ही स्पष्ट रूप से अवैध।
जस्टिस अमित महाजन ने कहा:
“कथित जालसाजी से संबंधित प्राथमिक साक्ष्य, अर्थात कथित जाली दस्तावेज़ के अभाव में, केवल आरोपों और विभागीय निष्कर्षों के आधार पर मुकदमा चलाना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द कर दिया और प्रक्रिया सर्वर की आरोपमुक्ति को बहाल कर दिया।