दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO मामले में राज्य सरकार की ओर से दायर अपील में 541 दिन की देरी माफ करने से इनकार करते हुए कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा दी गई वजह “स्पष्टीकरण नहीं बल्कि एक कमजोर बहाना” है।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की देरी माफी याचिका और उससे जुड़ी अपील दोनों खारिज कीं।

राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें आरोपी को POCSO Act की धारा 6 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के आरोपों से बरी किया गया था, जबकि उसे POCSO Act की धारा 10 के तहत दोषी ठहराया गया था।

देरी माफी के लिए राज्य की ओर से कहा गया कि फाइल कई विभागों से होकर गुजरी, जिनमें मुख्य अभियोजक कार्यालय, अभियोजन निदेशालय, विधि विभाग, मुख्य सचिव और उपराज्यपाल कार्यालय शामिल थे। आवश्यक स्वीकृतियां लेने में समय लग गया।

यह भी दलील दी गई कि संबंधित अतिरिक्त लोक अभियोजक लंबे समय तक चिकित्सीय अवकाश पर थे।

हाईकोर्ट ने इन कारणों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि सरकारी विभागों द्वारा प्रशासनिक प्रक्रिया और विभागीय पत्राचार का हवाला बार-बार दिया जाता है, लेकिन इससे समयसीमा कानून की कठोरता कम नहीं की जा सकती।

अदालत ने कहा,

“राज्य यह दावा नहीं कर सकता कि समयसीमा के मामलों में उसके लिए अलग या विशेष मानदंड लागू होंगे। सीमा कानून राज्य पर भी उतना ही लागू होता है जितना किसी निजी पक्षकार पर।”

कोर्ट ने आगे कहा कि “पर्याप्त कारण” की व्याख्या उचित तरीके से की जानी चाहिए, खासकर तब जब देरी अत्यधिक हो और उसका संतोषजनक स्पष्टीकरण न दिया गया हो।

खंडपीठ ने राज्य सरकार के रवैये को बेहद सुस्त, ढीला और लापरवाह बताते हुए कहा कि यदि ऐसे स्पष्टीकरणों को यांत्रिक ढंग से स्वीकार किया गया तो सीमा कानून का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

मामले के गुण-दोष पर भी अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार किया।

कोर्ट ने कहा कि FIR और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत दर्ज पीड़िता के शुरुआती बयान में आरोपी पर केवल निजी अंग छूने का आरोप था। उसमें डिजिटल दुष्कर्म या उंगली डालने जैसे आरोप नहीं लगाए गए।

इन्हीं कारणों के आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज की।

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