दिल्ली हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि किसी संगठन के प्रतिबंधित होने से पहले उसमें केवल एक नेतृत्व पद (Leadership Position) पर होना स्वतः ही मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) का अपराध नहीं बन जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक संगठन वैध था तब तक उससे जुड़ा होना किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बनाता।

यह टिप्पणी जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 'सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया' (SDPI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोइद्दीन कुट्टी के. उर्फ एम.के. फैजी को जमानत देते हुए की। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने फैजी पर PFI से जुड़े आतंकी वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए।

अदालत ने गौर किया कि ED का मामला काफी हद तक जुड़ाव के आधार पर दोष पर आधारित था। कोर्ट ने कहा कि फैजी का PFI के साथ संबंध 2009 से 2018 के बीच था और उस समय यह संगठन प्रतिबंधित नहीं था। PFI को सितंबर, 2022 में प्रतिबंधित किया गया, जबकि फैजी उससे बहुत पहले अलग हो चुके थे।

फैसले के दौरान जस्टिस ने महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किया,

"PFI में नेतृत्व पदों पर केवल बने रहना, जो 2009 से 2018 के दौरान एक वैध संगठन था, मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध नहीं बनाता। इसके अलावा, SDPI वर्तमान में एक वैध राजनीतिक दल है और सरकार द्वारा इसे गैर-कानूनी घोषित नहीं किया गया।"

कोर्ट ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति का किसी संगठन से जुड़ा होना या उसमें पद संभालना जब तक कि मनी लॉन्ड्रिंग की गतिविधियों में व्यक्तिगत संलिप्तता के विशिष्ट और ठोस सबूत न हों PMLA की धारा 3 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

फंड कलेक्शन और अपराध की कमाई

ED का मुख्य आरोप यह था कि अज्ञात स्रोतों से PFI और SDPI के खातों में पैसा जमा किया गया। इस पर हाइकोर्ट ने टिप्पणी की कि अज्ञात स्रोतों से धन प्राप्त करना किसी अन्य कानून के तहत अनियमित या अवैध हो सकता है, लेकिन इसे तब तक 'मनी लॉन्ड्रिंग' नहीं कहा जा सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि वह पैसा किसी विशिष्ट अनुसूचित अपराध से कमाया गया।

अदालत ने कहा,

"अज्ञात स्रोतों से प्राप्त धन का उपयोग विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह अपने आप में उस धन को PMLA के तहत 'अपराध की कमाई' नहीं बना देता। फंड जुटाने का तरीका किसी कानून के तहत अपराध हो सकता है, लेकिन PMLA की धारा 3 के तहत इसे तब तक मनी लॉन्ड्रिंग नहीं माना जाएगा, जब तक उसके पीछे कोई आपराधिक स्रोत सिद्ध न हो।"

अदालत ने पाया कि प्रथम दृष्टया ऐसा कोई सबूत नहीं है कि प्राप्त फंड किसी अनुसूचित अपराध के जरिए जुटाया गया। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि PMLA की धारा 45 के तहत लगाई गई कड़ी शर्तें पूरी होती हैं और याचिकाकर्ता को जमानत दी।

Tags: