तीन दशक पुराने भुगतान दावों पर झटका: दिल्ली हाईकोर्ट ने कश्मीरी प्रवासी ठेकेदारों की अपील खारिज की
दिल्ली हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी ठेकेदारों की अपील खारिज की, जिसमें उन्होंने 1989 से पहले किए गए सरकारी कामों के लंबित भुगतानों की मांग की थी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार किया कि इतने लंबे समय के बाद दावों की पुष्टि के लिए आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने सिंगल जस्टिस का फैसला बरकरार रखा। ठेकेदारों का कहना था कि उन्होंने लोक निर्माण विभाग और अन्य सरकारी एजेंसियों के लिए काम किया, लेकिन घाटी में बिगड़ती कानून-व्यवस्था के कारण 1989 में उन्हें अचानक पलायन करना पड़ा और उनके भुगतान लंबित रह गए।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे अपने घर, संपत्ति और जरूरी दस्तावेज पीछे छोड़कर आए, इसलिए समय पर दावे प्रस्तुत नहीं कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार द्वारा आंशिक भुगतान किया जाना इस बात का संकेत है कि बाकी रकम भी देय है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह माना कि उस समय जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं और बड़ी संख्या में लोगों को पलायन करना पड़ा।
अदालत ने कहा,
“याचिका पहली बार वर्ष 2001 में दायर की गई, जो पलायन के करीब ग्यारह साल बाद है। यह माना जा सकता है कि याचिकाकर्ता वापसी की उम्मीद में इतने समय तक प्रतीक्षा करते रहे।”
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य सवाल यह है कि क्या दावा की गई राशि का भुगतान प्रमाणित किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद रिकॉर्ड का उपलब्ध न होना एक स्वाभाविक स्थिति है और इससे सरकार की किसी दुर्भावना का संकेत नहीं मिलता।
अदालत ने टिप्पणी की,
“समय बीतने के साथ रिकॉर्ड उपलब्ध न होना संभव है। दावे 1989 से पहले किए गए कामों से जुड़े हैं, जो लगभग 37 साल पुराने हैं।”
इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपील खारिज की।