जंतर-मंतर संपत्ति मामले में कांग्रेस की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस, केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब तलब
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) की ओर से दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामला जंतर-मंतर रोड स्थित संपत्ति के बिक्री अथवा हस्तांतरण विलेख के निष्पादन से जुड़ा है।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने केंद्र सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय और दिल्ली सरकार से इस मामले में जवाब मांगा।
कांग्रेस की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और एडवोकेट आदिल बोपराय ने पक्ष रखा, जबकि केंद्र सरकार की ओर से एडवोकेट आशीष दीक्षित उपस्थित हुए।
सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा कि कांग्रेस इस संपत्ति की विधिवत आवंटी है और कई दशकों से उसके कब्जे में है, लेकिन बार-बार अनुरोध के बावजूद दिल्ली सरकार हस्तांतरण विलेख निष्पादित नहीं कर रही है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका की स्वीकार्यता पर संदेह जताते हुए कहा कि कांग्रेस को दीवानी वाद दायर करना चाहिए था, फिर भी अदालत ने मुख्य याचिका और अंतरिम राहत की मांग पर नोटिस जारी कर दिया।
मामले की अगली सुनवाई 14 सितंबर को होगी।
बता दें, याचिका में कांग्रेस ने दावा किया कि उसने वर्ष 1959 में ही इस संपत्ति की पूरी बिक्री राशि जमा कर दी थी। पार्टी के अनुसार भारत सरकार ने वर्ष 1956 में यह संपत्ति कांग्रेस को आवंटित की थी और 6 लाख 10 हजार 700 रुपये की तय राशि के साथ अतिरिक्त प्रीमियम और भू-भाड़ा भी मई 1959 में जमा करा दिया गया था।
याचिका में आगे कहा गया कि पुनर्वास मंत्रालय ने 16 जनवरी 1956 के पत्र के जरिए संपत्ति के एक हिस्से का आवंटन मंजूर किया था और विस्थापित संपत्ति संरक्षक को इसे जारी करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद 31 जनवरी 1956 के एक अन्य पत्र में कांग्रेस से प्रतिनिधि भेजकर आवंटन पत्र प्राप्त करने और संपत्ति का कब्जा लेने को कहा गया था।
कांग्रेस का कहना है कि पूरी राशि जमा होने के बावजूद संपत्ति के कुछ हिस्सों में रह रहे किरायेदारों द्वारा शुरू किए गए मुकदमों और बाद में वर्ष 1969 में पार्टी विभाजन के कारण हस्तांतरण विलेख का निष्पादन लंबित रहा।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि वर्ष 2017 से 2026 के बीच कई बार आग्रह और विभागीय स्तर पर सकारात्मक सिफारिशों के बावजूद अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया और न ही विलेख निष्पादित किया गया।
कांग्रेस ने दलील दी है कि अधिकारियों की यह निष्क्रियता मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है। पार्टी का कहना है कि पूरी राशि स्वीकार करने और आंतरिक रूप से अधिकार मान लेने के बाद भी राज्य सरकार अनिश्चितकाल तक विलेख निष्पादन टाल नहीं सकती।