खुद खर्च नहीं दिया, फिर पत्नी की दलीलें हटाने की मांग नहीं कर सकता पति: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-05-07 12:13 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पति स्वयं अदालत के आदेश का पालन करते हुए मुकदमे का खर्च समय पर नहीं देता तो वह बाद में पत्नी की लिखित जवाब दाखिल करने में देरी का लाभ उठाकर उसकी पैरवी का अधिकार खत्म करने की मांग नहीं कर सकता।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने पति की उस अपील को खारिज किया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में पत्नी को लिखित जवाब दाखिल करने का अधिकार बहाल किया था।

मामले में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(IA) के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। 18 अप्रैल, 2024 को फैमिली कोर्ट ने पति को निर्देश दिया था कि वह एक सप्ताह के भीतर पत्नी को मुकदमे के खर्च के तौर पर 11 हजार रुपये दे। साथ ही पत्नी को लिखित जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था।

हालांकि, पति ने निर्धारित समय में मुकदमे का खर्च नहीं दिया, जिसके कारण पत्नी समय पर अपना लिखित जवाब दाखिल नहीं कर सकी।

इसके बाद पति ने पत्नी का पक्ष समाप्त करने की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया। इस पर फैमिली कोर्ट ने 20 सितंबर, 2024 को पत्नी का लिखित जवाब दाखिल करने का अधिकार समाप्त किया था।

बाद में पत्नी ने अपना अधिकार बहाल करने की मांग की। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए उसका आवेदन स्वीकार किया कि देरी के लिए स्वयं पति जिम्मेदार है, क्योंकि उसने समय पर मुकदमे का खर्च नहीं दिया।

हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी ने अधिकार बहाली के लिए बहुत देर से आवेदन किया और दीवानी प्रक्रिया संहिता के तहत तय समयसीमा समाप्त हो चुकी थी।

अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून का सिद्धांत यह है कि कोई भी पक्ष अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा,

“यह सिद्धांत केवल अंतिम फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पक्षकारों के आचरण पर लागू होता है।”

पीठ ने कहा कि पति का दायित्व था कि वह समय पर मुकदमे का खर्च देता ताकि पत्नी अपने मामले की उचित पैरवी कर सके।

अदालत ने स्पष्ट कहा,

“पति अपने आचरण से पत्नी को नुकसान की स्थिति में डालकर बाद में उसी का फायदा नहीं उठा सकता।”

कोर्ट ने सेश नाथ सिंह बनाम बैद्यबती श्योराफुली कोऑपरेटिव बैंक मामला में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि यदि परिस्थितियां उचित हों तो अदालत औपचारिक आवेदन के बिना भी देरी माफ कर सकती है।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज की।

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