कोर्ट कार्यवाही के अनधिकृत वीडियो की पहले से पहचान कर हटाने के लिए बाध्य नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट में Google और Meta
गूगल LLC और मेटा प्लेटफॉर्म्स ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा है कि वे सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे अदालत की कार्यवाही के कथित अनधिकृत वीडियो की पहले से पहचान (Proactive Identification), निगरानी और हटाने के लिए बाध्य नहीं हैं। दोनों कंपनियों ने कहा कि वे केवल मध्यस्थ (Intermediaries) हैं और उपयोगकर्ताओं द्वारा अपलोड किए गए प्रत्येक कंटेंट की वैधता का स्वतः आकलन करना उनके लिए संभव नहीं है।
यह जवाब वैभव सिंह द्वारा दायर याचिका में दाखिल किया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (AAP) के अन्य नेताओं ने 13 अप्रैल को सीबीआई की आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से स्वयं को अलग करने (Recusal) की मांग से जुड़ी अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग कर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित किया।
इससे पहले 23 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालत की कार्यवाही वाले वीडियो और पोस्ट हटाने का निर्देश दिया था।
अपने हलफनामे में मेटा ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत, जिसमें भविष्य में अपलोड होने वाले ऐसे कंटेंट की स्वतः पहचान कर उसे हटाने की मांग की गई है, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 और सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों के विपरीत है, जिनमें कहा गया है कि इंटरमीडियरी को अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंटेंट की सक्रिय निगरानी के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मेटा ने कहा कि किसी वीडियो के अवैध होने या अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग होने का निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों, संदर्भ और न्यायालय के आदेशों के आधार पर ही किया जा सकता है। हालांकि, कंपनी ने स्पष्ट किया कि वह न्यायालय के निर्देशानुसार या याचिकाकर्ता द्वारा चिन्हित विशिष्ट URL के विरुद्ध कार्रवाई करने को तैयार है।
इसी तरह गूगल ने भी अपने जवाब में कहा कि यूट्यूब पर अपलोड किए गए प्रत्येक वीडियो की पहले से निगरानी करना असंभव है। कंपनी ने कहा कि वह न तो विवादित कंटेंट की निर्माता है, न उसकी मालिक और न ही उसका नियंत्रण उसके पास है। गूगल ने कहा कि किसी वीडियो की सामग्री की जानकारी केवल उसे अपलोड करने वाले उपयोगकर्ता को होती है और यदि कोई कानूनी जिम्मेदारी बनती है तो वह अपलोडर की होगी, न कि प्लेटफॉर्म की।
मामले की सुनवाई जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ के समक्ष हुई। चूंकि कई प्रतिवादियों को अभी नोटिस की तामील नहीं हुई थी, इसलिए अदालत ने मामले की सुनवाई अगले महीने के लिए स्थगित कर दी।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालत की कार्यवाही के वीडियो प्रसारित कर न्यायपालिका की छवि धूमिल करने और आम जनता को गुमराह करने का प्रयास किया गया। याचिकाकर्ता ने संबंधित वीडियो हटाने, विस्तृत जांच कराने तथा दिल्ली हाईकोर्ट के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमों के कथित उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।