पाठ्यक्रम से बाहर सवाल हटने पर अभ्यर्थियों को 'फ्री अंक' नहीं मिल सकते: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और रिस्टोरर विभागीय परीक्षा से जुड़े मामले में कहा कि पाठ्यक्रम से बाहर पाए गए और बाद में हटाए गए प्रश्नों के लिए अभ्यर्थियों को स्वतः फ्री अंक देने का कोई अधिकार नहीं बनता।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने वह याचिका खारिज की, जिसमें परीक्षा मूल्यांकन पद्धति को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता दिल्ली हाईकोर्ट में चालक और कोर्ट अटेंडेंट जैसे ग्रुप-सी पदों पर कार्यरत कर्मचारी थे। उन्होंने जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और रिस्टोरर के 71 पदों के लिए आयोजित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा में हिस्सा लिया था।
मामला उस समय विवाद में आया जब परीक्षा प्रकोष्ठ ने लिखित परीक्षा के कुछ प्रश्नों को पाठ्यक्रम से बाहर पाया। सामान्य ज्ञान के तीन और सामान्य अंग्रेजी का एक प्रश्न बाद में हटा दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर घोषित कर दिए गए, तब उन सभी अभ्यर्थियों को पूरे अंक दिए जाने चाहिए थे, जिन्होंने उन प्रश्नों का प्रयास किया था। उनका आरोप था कि अपनाई गई मूल्यांकन प्रक्रिया मनमानी और भेदभावपूर्ण थी।
वहीं, हाईकोर्ट प्रशासन ने अदालत को बताया कि हटाए गए प्रश्नों के अंक शेष वैध प्रश्नों में अनुपातिक रूप से जोड़ दिए गए। साथ ही जिन अभ्यर्थियों ने हटाए गए प्रश्न सही हल किए थे, उन्हें उसका लाभ भी दिया गया।
अदालत ने मूल्यांकन प्रक्रिया की जांच के बाद इसे निष्पक्ष और गैर-मनमाना माना।
खंडपीठ ने कहा कि अपनाई गई पद्धति से कुल अंक और कट-ऑफ को बनाए रखते हुए हटाए गए प्रश्नों का भार बाकी प्रश्नों में समायोजित किया गया।
अदालत ने यह भी कहा कि जिन अभ्यर्थियों ने हटाए गए प्रश्न सही किए, उन्हें उनके प्रयास का लाभ मिला। अदालत ने एक अभ्यर्थी का उदाहरण भी दिया, जिसके अंक इस प्रक्रिया के बाद बढ़े और उसे सफल घोषित किया गया।
खंडपीठ ने कहा,
“याचिकाकर्ताओं की यह मांग कि गलत उत्तर देने के बावजूद उन्हें हटाए गए प्रश्नों के पूरे अंक दिए जाएं, किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है।”
अदालत ने कानपुर विश्वविद्यालय बनाम समीर गुप्ता मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी यह नहीं कहता कि गलत उत्तर देने वाले अभ्यर्थियों को हटाए गए प्रश्नों के लिए फ्री अंक दिए जाएं।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासन चाहे तो हटाए गए प्रश्नों के अंक पूरी तरह नजरअंदाज कर सकता था, लेकिन उसने अभ्यर्थियों के हित में अधिक लाभकारी तरीका अपनाया।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका खारिज की।