मॉडल आचार संहिता के दौरान दिल्ली मेट्रो में राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक वैध: हाईकोर्ट ने चुनौती खारिज की

Update: 2026-06-20 07:12 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव के दौरान लागू मॉडल आचार संहिता के समय दिल्ली मेट्रो की ट्रेनों और स्टेशनों पर राजनीतिक विज्ञापनों पर चुनाव आयोग द्वारा लगाई गई रोक को वैध ठहराया। अदालत ने कहा कि यह प्रतिबंध उचित है, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के बड़े सार्वजनिक हित की पूर्ति करता है तथा विज्ञापन एजेंसियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता।

जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने इस संबंध में विज्ञापन एजेंसियों की अपील खारिज की। ये एजेंसियां दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) के साथ दीर्घकालिक विज्ञापन लाइसेंस रखती थीं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चुनाव आयोग के वर्ष 2019 के उस निर्देश, जिसके तहत DMRC को अपने अनुबंधों में मॉडल आचार संहिता के दौरान राजनीतिक विज्ञापन प्रतिबंधित करने का प्रावधान जोड़ने को कहा गया, मनमाना और भेदभावपूर्ण है। उनका कहना था कि इससे संविधान के अनुच्छेद 14 तथा अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ग) के तहत प्राप्त अधिकारों का हनन होता है।

वहीं चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत प्राप्त व्यापक अधिकारों का उपयोग करते हुए जारी किया गया, ताकि चुनाव के दौरान सभी दलों के लिए समान अवसर सुनिश्चित किए जा सकें।

DMRC ने भी आयोग के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा कि एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम होने के नाते वह चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य है।

खंडपीठ ने कहा कि विज्ञापन एजेंसियों के व्यावसायिक हित स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जैसे बड़े सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं हो सकते।

अदालत ने कहा,

"अपीलकर्ताओं के व्यवसाय पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया। वे मॉडल आचार संहिता के दौरान भी गैर-राजनीतिक विज्ञापन प्रदर्शित करने के लिए स्वतंत्र हैं। सीमित अवधि के लिए केवल राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक लगाने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें किसी भी प्रकार का विज्ञापन प्रदर्शित करने से रोका गया। इसलिए अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ग) के उल्लंघन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।"

विज्ञापन एजेंसियों ने यह भी तर्क दिया कि यह रोक भेदभावपूर्ण है, क्योंकि बस स्टॉप और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर राजनीतिक विज्ञापन जारी रहते हैं।

हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया। अदालत ने कहा कि मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें सीधे तौर पर सरकारी व्यवस्था से जुड़ी और उसकी पहचान का हिस्सा मानी जाती हैं, जबकि बस शेल्टरों की स्थिति अलग है। इसलिए दोनों के बीच किया गया वर्गीकरण उचित और तर्कसंगत है।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता वस्तुतः "नकारात्मक समानता" की मांग कर रहे हैं, जिसे कानून मान्यता नहीं देता।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपील खारिज की और चुनाव आयोग के निर्देशों को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि मॉडल आचार संहिता के दौरान दिल्ली मेट्रो में राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक उचित और वैध कदम है।

Tags:    

Similar News