गोपनीय जानकारी लीक करना बदनामी नहीं, सिर्फ अनुबंध उल्लंघन हो सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी द्वारा कंपनी की गोपनीय जानकारी उजागर करने का आरोप, भले ही सही मान लिया जाए तो वह अधिकतम अनुबंध का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन उसे अपने आप बदनामी (मानहानि) नहीं माना जा सकता।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने पुस्तक कंपनी की अपील खारिज करते हुए यह फैसला दिया। कंपनी ने अपने पूर्व कर्मचारी पर 10 लाख रुपये हर्जाने की मांग करते हुए मानहानि का मुकदमा दायर किया था।
पूरा मामला
कंपनी का आरोप था कि पूर्व कर्मचारी ने प्रतिस्पर्धी कंपनियों से संपर्क कर उनके व्यापार और ग्राहकों से जुड़ी गोपनीय जानकारी साझा की। साथ ही यह भी दावा किया गया कि उसने अन्य कर्मचारियों से संपर्क कर कंपनी के खिलाफ गलत बातें कही।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने पहले ही आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया था कि इसमें कोई ठोस कारण (कॉज ऑफ एक्शन) नहीं बनता। इसके खिलाफ कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
हाईकोर्ट की टिप्पण
अदालत ने कहा,
“यह मामला गोपनीयता और रोजगार अनुबंध के उल्लंघन से जुड़ा हो सकता है लेकिन इसमें किसी तीसरे पक्ष के सामने की गई मानहानिकारक टिप्पणी का उल्लेख नहीं है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मानहानि के लिए जरूरी है कि कोई आपत्तिजनक या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली बात किसी तीसरे व्यक्ति तक पहुंचाई गई हो।
कंपनी द्वारा लगाए गए आरोपों पर अदालत ने कहा कि याचिका में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कर्मचारी ने क्या कहा, किससे कहा और किस संदर्भ में कहा।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ यह कहना कि कर्मचारी ने संपर्क किया या बातचीत की पर्याप्त नहीं है। जब तक स्पष्ट रूप से मानहानिकारक कथन और उसका प्रसार नहीं दिखाया जाता तब तक मानहानि का मामला नहीं बनता।”
दालत ने पाया कि याचिका अस्पष्ट और तथ्यों से रहित है, इसलिए इसमें मानहानि का कोई आधार नहीं बनता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कंपनी की अपील खारिज की।